[डॉ. श्रीरंग गोडबोले] देवबंदी मदरसे दार अल-उलूम (ज्ञान का घर) की स्थापना 1867 में उत्तर-पश्चिम उत्तर प्रदेश के देवबंद कस्बे की एक मस्जिद में हुई थी जिसके संस्थापक शाह वलीउल्लाह द्वारा स्थापित दिल्ली मदरसा के तीन पूर्व छात्र- मौलाना मुहम्मद कासिम नानोतवी (1832-1880), मौलाना रशीद अहमद गंगोही (1826-1905) और मौलाना जुल्फिकार अली (1819-1904) थे।

पश्चिमी शिक्षा की कुछ संगठनात्मक विशेषताओं को अपनाते हुए, उन्होंने पारंपरिक इस्लामी पाठ्यक्रम में सुधार करने और इस्लामी सामाजिक व्यवस्था के पुनर्निर्माण का लक्ष्य रखा। सरकारी संरक्षण पर निर्भर रहने के बजाय, उन्होंने मुस्लिमों के सभी वर्गों से वित्तीय सहायता की मांग की। अलीगढ़ वालों की तरह शुरू में वे नवगठित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से दूर रहे। फिर गंगोही ने एक फतवा जारी किया कि मुस्लिमों को अंग्रेजों से रियायतें प्राप्त करने के लिए हिंदुओं के साथ सहयोग करना ठीक था, बशर्ते ऐसी गतिविधि इस्लाम के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन न करती हों (द खिलाफत मूवमेंट: रिलीजियस सिम्बोलिज्म एंड पोलिटिकल मोबिलाइजेशन इन इंडिया, गेल मिनाल्ट, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1982, पृ. 24)। अलीगढ़ कॉलेज की तरह, देवबंदियों के दिमाग में केवल मुस्लिम हित थे और यदि मुस्लिम हितों की पूर्ति करते तो हिंदुओं के साथ सहयोग भी उन्हें स्वीकार्य था।

तीनों संस्थापकों की मृत्यु के बाद, दार अल-उलूम देवबंद का दायित्व काफी हद तक मौलाना महमूद अल-हसन (1851-1920) पर आ गया, जो बाद में राजनीति में सक्रिय हो गए। 8 जून 1920 को केंद्रीय खिलाफत समिति द्वारा उन्हें 'शेख़ अल-हिंद' की उपाधि दी गई। पश्चिम में शिक्षित मुस्लिम युवकों को इस्लामी रंग ढंग देने के लिए मौलाना महमूद-अल हसन ने 1913 में दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद में एक कुरान स्कूल शुरू किया। नजारत अल-मआरिफ अल-कुरानियाह (कुरान के ज्ञान का वैभव) नाम का यह स्कूल दो साल तक चला।

नजारत अल-मआरिफ अल-कुरानियाह नाम के इस स्कूल में मौलाना महमूद-अल हसन के एक पूर्व छात्र मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी (1872-1944) ने उनकी मदद की। मौलाना उबैदुल्लाह, एक धर्म परिवर्तित सिख थे। यह एक रोचक तथ्य है कि आंतरिक प्रतिद्वंद्विता के चलते देवबंद मदरसे ने 1913 में इन्हीं उबैदुल्लाह सिंधी को काफिर घोषित करते हुए एक फतवा जारी किया था।

नजारत अल-मआरिफ अल-कुरानियाह के संरक्षक अलीगढ़ के दो ट्रस्टी हकीम अजमल खान और डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी (1880-1936) थे, जिनका क्लिनिक नजारत के नजदीक ही स्थित था। हकीम अजमल खान (1865-1927) ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के संस्थापक सदस्य थे और 1919 में इसके अध्यक्ष भी बने। वे 1919-25 तक केंद्रीय खिलाफत समिति के उपाध्यक्ष रहे और 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने।

डॉ. अंसारी दिल्ली में अजमल खान और अली भाइयों के साथ अत्यंत घनिष्ठ हो गए। 1912-13 में उन्होंने तुर्की में रेड क्रिसेंट मेडिकल मिशन का नेतृत्व किया। उसी वर्ष, वह ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के सदस्य बन गए। 1919 से वह अखिल भारतीय कांग्रेस समिति और केंद्रीय खिलाफत समिति दोनों के सदस्य के रूप में कार्य करते रहे। वह 1922 में खिलाफत सम्मेलन के अध्यक्ष भी बने। यह डॉ अंसारी ही थे, जिन्होंने मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी को मुहम्मद अली और अबुल कलाम आजाद से परिचित कराया था जो उस समय एक पत्रकार थे (मिनाल्ट, उक्त, पृ.30)। महमूद अल-हसन और सिंधी दोनों को रेशमी पत्र षड्यंत्र (1913-20) में अभियुक्त बनाया गया, जिसमें वे ओटोमन तुर्की, जर्मनी और अफगानिस्तान का गठबंधन बनाकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांति करने के प्रयास शुरू करने वाले थे।

महमूद अल-हसन के एक अन्य देवबंदी सहयोगी मौलाना हुसैन अहमद मदनी (1879-1957) थे, जिन्होंने मदीना और हिजाज का प्रवास किया और 1902 में ओटोमन नागरिकता हासिल कर ली। वह महमूद अल-हसन के अखिल-इस्लामी योजनाओं में सह-षड्यंत्रकर्ता थे। इसी कारण 1916 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। उसके बाद उन्हें 1917 से 1920 के दौरान अंग्रेजों द्वारा माल्टा में नजरबंद कर रखा गया। बाद में वह खिलाफत आंदोलन में शामिल हो गए। जामिया मिलिया इस्लामिया (राष्ट्रीय इस्लामी विश्वविद्यालय) की स्थापना 29 अक्टूबर 1920 को अलीगढ़ में महमूद अल-हसन, मुहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल खान, एमए अंसारी द्वारा ब्रिटिश प्रभाव से मुक्त मुस्लिम विश्वविद्यालय शुरू करने के उद्देश्य से की गई थी।

(लेखक ने इस्लाम, ईसाइयत, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धी आंदोलन और धार्मिक जनसांख्यिकी पर पुस्तकें लिखी हैं।)

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