युवा मूर्तिकार कपिल कपूर की मूर्तियां न केवल पांच सितारा होटलों, बल्कि बड़े-बड़े इंस्टीट्यूशंस में भी आसानी से देखी जा सकती हैं। दरअसल, वे भारत और अफ्रीका के ट्राइबल आर्ट पर आधारित मूर्तियां बनाते हैं, जो कला के मुरीदों को बहुत भाती हैं।

अब तक का सफर

कॉमर्स का स्टूडेंट होने के बावजूद कपिल कपूर का रुझान मूर्तियां बनाने की तरफ था। दरअसल, घर में उनके पिता और दादाजी पीतल की मूर्तियां बनाते थे। उन्होंने कभी इसकी विधिवत ट्रेनिंग नहीं ली। भारत और यूरोपियन शैली की मूर्तियों का उन्होंने तुलनात्मक अध्ययन किया और खुद मूर्तियां बनाना सीखा। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे भारत के ख्याति प्राप्त पेंटर सतीश गुजराल के शिष्य बन गए। उनके असिस्टेंट बनकर उन्होंने खूब मूर्तियां तराशीं और जगह-जगह प्रदर्शनियों में भाग लिया। वे अब तक मुंबई, जोधपुर, इंदौर, गुड़गांव, दिल्ली की प्रदर्शनियों में भाग लेकर खूब वाहवाहियां लूट चुके हैं।

आपकी उपलब्धि

मैं रिअलिस्टिक व‌र्ल्ड पर अधिक काम करता हूं। मेरी मूर्तियां इंटलेक्चुअल, रिअलिस्टिक व स्पिरिचुअल थीम पर आधारित होती हैं। इसी कारण इन्हें बुद्धिजीवी व आम लोग दोनों पसंद करते हैं। मेरी मूर्तियां बड़ी-बड़ी कंपनियों के होटलों व रेस्टरां के साथ-साथ शिक्षण केंद्रों में भी लगाई जातीे रहीे हैं। साउथ अफ्रीकी हाइ कमीशन ने भी मेरी मूर्तियों को सराहा है।

क्या थीम बेस्ड मूर्तियां बनाते हैं?

मुझे शुरू से ट्राइबल आर्ट आकर्षित करती रही है और मैं इन्हें ही अपनी थीम बनाता हूं। यही वजह है कि मेरी बनाई हुई ज़्यादातर मूर्तियां भारत और अफ्रीका के ट्राइबल आर्ट पर आधारित होते हैं। वैसे भारत में कई तरह की ट्राइबल आर्ट हैं, लेकिन मैं छत्तीसगढ़ की बस्तर आर्ट और पश्चिम बंगाल के डोकरा आर्ट से विशेष रूप से प्रभावित हूं। लगातार काम करते हुए भी कई बार नए-नए आइडियाज दिमाग में आते हैं।

यूथ को मेसेज

अगर आप अपने काम में परफेक्शन चाहते हैं तो धैर्य रखना जरूरी है। बिना रुके बिना, थके व बिना हार माने लगातार काम करते रहने से ही सफलता मिलती है।

(स्मिता)

Posted By: deepali grover