संजीव गुप्ता, नई दिल्ली

समाज के हर वर्ग और सुदूर क्षेत्रों में पुस्तक संस्कृति का विकास करने के लिए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) अब जनजातीय भाषाओं व बोलियों में भी पुस्तकें प्रकाशित करेगा। इस दिशा में 10 भाषाओं व बोलियों का चयन किया गया है। साथ ही एनबीटी की योजना क्षेत्रीय भाषाओं में पुस्तक प्रकाशन का विस्तार करने की भी है।

मौजूदा समय में एनबीटी 22 भारतीय भाषाओं व 10 क्षेत्रीय भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित कर रहा है। सालभर में करीब 500 नई पुस्तकें प्रकाशित की जाती हैं, जिनकी प्रतियां लाखों में होती हैं। ऐसी तमाम क्षेत्रीय पुस्तकों को क्षेत्र विशेष में आशानुरूप प्रतिक्रिया मिल रहा है इसीलिए एनबीटी ने जनजातीय भाषाओं व बोलियों को भी शामिल करने का निर्णय लिया है।

अधिकारियों के मुताबिक, यह सही है कि देशभर में अधिकांश पाठक ¨हदी या अंग्रेजी के हैं, लेकिन सुदूर क्षेत्रों में ऐसे भी लाखों पाठक हैं, जो पढ़ना चाहते हैं, मगर अपनी भाषा या बोली में साहित्य उपलब्ध नहीं होने के कारण इससे वंचित रह जाते हैं। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोग ¨हदी या अंग्रेजी का बहुत ज्ञान नहीं रखते हैं लेकिन स्थानीय भाषा एवं बोली पर शानदार पकड़ रखते हैं। इसके मद्देनजर पिछले वर्ष संस्कृत को भी शामिल किया गया। प्रयोग के तौर पर जनवरी 2018 में प्रगति मैदान में लगाए गए 26वें विश्व पुस्तक मेले में मैथिली पुस्तकों के एक प्रकाशक को नि:शुल्क स्टॉल दिया गया, जहां इस भाषा के पाठकों ने भी काफी संख्या में किताबें खरीदी। बॉक्स-1

जिन जनजातीय भाषा व बोली में प्रकाशित होंगी पुस्तकें

1. मैथिली

2. भोजपुरी

3. मगही (बिहार में प्रचलित)

4. नेपाली (सिक्किम में प्रचलित)

5. काकबरथ (त्रिपुरा में प्रचलित)

6. मंडारी

7. संथाली (झारखंड में प्रचलित)

8. गोंडी

9. हड़बी

10. भकरी (बस्तर में प्रचलित) बॉक्स-2

डिजिटल संस्कृति के इस दौर में भी पुस्तकों के प्रति पाठकों का रुझान न केवल कायम है बल्कि बढ़ भी रहा है। पुस्तकें पढ़ी जा रही हैं, बिक रही हैं, इसीलिए छप भी रही हैं। एनबीटी भी इसी वजह से पुस्तक प्रकाशन का दायरा बढ़ा रहा है। अब जनजातीय भाषाओं और बोलियों में भी पाठकों को पुस्तकें उपलब्ध होंगी। हर हाथ एक पुस्तक योजना भी सफल हो रही है।

-बलदेव भाई शर्मा, अध्यक्ष, एनबीटी

Posted By: Jagran

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