1980 की वोटर लिस्ट में सोनिया गांधी के नाम को लेकर हुई FIR की मांग पर फिर हुई सुनवाई, 29 को होगी पेशी
सत्र अदालत ने सोनिया गांधी के मतदाता सूची मामले में एफआईआर की मांग खारिज करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश ...और पढ़ें

फिलहाल सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का कोई आदेश नहीं हुआ है। फाइल फोटो
HighLights
सत्र अदालत ने एफआईआर की मांग खारिज करने का आदेश रद्द किया।
मामला एसीजेएम के पास वापस, 29 सितंबर को नए सिरे से सुनवाई।
कोर्ट ने मतदाता सूची की पवित्रता को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से जुड़े मतदाता सूची मामले में राउज एवेन्यू स्थित सत्र अदालत ने एफआईआर की मांग खारिज करने वाला ट्रायल कोर्ट का आदेश रद कर दिया है।
विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का आदेश कानून और आरोपों की गलत समझ पर आधारित था और उसमें पर्याप्त कारण नहीं दिए गए।
मामला वापस एसीजेएम के पास भेजते हुए नए सिरे से सुनवाई के निर्देश दिए गए हैं। अब 29 सितंबर को अगली सुनवाई होगी। फिलहाल सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का कोई आदेश नहीं हुआ है।
कोर्ट ने पूछा बड़ा सवाल?
कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची में छेड़छाड़, किसी गैर-नागरिक का नाम शामिल करने या झूठी घोषणा व दस्तावेज के इस्तेमाल के आरोप हों तो यह देखना जरूरी है कि आरोपों से संज्ञेय अपराध की स्थिति स्पष्ट होती है या नहीं।
इसके लिए कारणयुक्त आदेश पारित करना जरूरी है। विशेष न्यायाधीश ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मामले के मूल सवाल पर विचार नहीं किया। उसे यह तय करना था कि शिकायत में संज्ञेय अपराध बनता है या पुलिस जांच की जरूरत है।
इसके बजाय वह नागरिकता से जुड़े केंद्र सरकार के अधिकार और मतदाता सूची को लेकर निर्वाचन आयोग की शक्तियों के सवाल में चली गई। कोर्ट ने सवाल उठाया कि निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की शक्ति फर्जी तरीके से नाम शामिल करने की पुलिस जांच में बाधा कैसे हो सकती है?
मतदाता सूची को लोकतंत्र में महत्वपूर्ण बताया
कोर्ट ने कहा कि संसदीय लोकतंत्र में मतदाता सूची की पवित्रता प्रत्येक नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है। प्रभावशाली व्यक्ति हो या सामान्य नागरिक, मतदाता के रूप में कानून के सामने सभी समान हैं। इसलिए मतदाता सूची में छेड़छाड़ या धोखाधड़ी के आरोपों पर उचित तरीके से विचार किया जाना चाहिए।
1980 में नाम, 1982 में हटाया और 1983 में फिर दर्ज
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में इस बात पर चर्चा तक नहीं की गई कि सोनिया गांधी का नाम साल 1980 में मतदाता सूची में शामिल हुआ, 1982 में हटाया गया और 1983 में फिर दर्ज हुआ।
शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी का आरोप है कि सोनिया गांधी का नाम 1980 की नई दिल्ली क्षेत्र की मतदाता सूची में था, जबकि उन्हें भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को मिली थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि नागरिकता मिलने से पहले नाम दर्ज कराने में फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। इन्हीं आरोपों पर एफआईआर और जांच की मांग की गई थी।
उपलब्ध दो विकल्पों पर भी विचार नहीं
विशेष न्यायाधीश ने बीएनएस की धारा 175(3) का उल्लेख करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने दो विकल्प थे। संज्ञेय अपराध सामने आने पर एफआईआर और पुलिस जांच का निर्देश देना या शिकायत पर संज्ञान लेकर धारा 223 (आदेश की जानबूझकर अवहेलना या अवज्ञा) के तहत शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज करना।
ट्रायल कोर्ट ने इनमें से किसी विकल्प पर विचार नहीं किया। धारा 175(3) मजिस्ट्रेट को पुलिस को मामले की जांच या एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने का अधिकार देती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित पुलिस अधिकारी को नहीं सुना गया और थाने से स्थिति रिपोर्ट भी नहीं मंगाई गई। इसे धारा 175(3) के पालन में गंभीर कमी माना गया।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश के चारों आधारों को गलत और अनुचित बताते हुए उसे रद कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने शिकायत खारिज करते समय कहा था कि जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोपों के समर्थन में आवश्यक तथ्य नहीं दिए गए हैं और 1980 की मतदाता सूची का दस्तावेज भी अप्रमाणित प्रति की प्रति था।
