स्मार्ट क्लास की बड़ी स्क्रीन से बच्चों की आंखों पर बढ़ा खतरा, AIIMS में एक साल में आए 1500 मायोपिया के केस
स्मार्ट क्लास में बढ़ती स्क्रीन उपयोग से बच्चों की आंखों और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। एम्स ...और पढ़ें

एआई जेनेरेटेड इमेज।
HighLights
स्मार्ट क्लास में स्क्रीन उपयोग से बच्चों की आंखों को नुकसान।
एम्स में एक साल में 1500 से अधिक बच्चों में मायोपिया।
गौतम बुद्ध नगर ने स्कूलों में स्क्रीन टाइम सीमित किया।
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। कक्षाओं में स्मार्ट टीवी और स्मार्ट बोर्ड का बढ़ता उपयोग बच्चों की आंखों को खराब कर रहा है। एम्स के डा. राजेंद्र प्रसाद नेत्र विज्ञान केंद्र में एक वर्ष में पहुंचे 1500 अधिक बच्चों में मायोपिया मिला।
डा. राजेंद्र प्रसाद नेत्र विज्ञान केंद्र के शोधकर्ताओं का 2026 में नार्थ इंडिया मायोपिया स्टडी में प्रकाशित स्टडी के अनुसार दिल्ली के 20 स्कूलों में 9,884 बच्चों में से 1297 बच्चे (13.1 प्रतिशत) मायोपिया से प्रभावित मिले थे।
इसका कारण लंबे समय तक पढ़ने-लिखने, कंप्यूटर, इंटरनेट मीडिया और वीडियो गेम के बढ़ते उपयोग को मायोपिया का खतरा बताया गया। इसके विपरीत प्रतिदिन दो घंटे से अधिक समय बाहर बिताने वाले बच्चों में मायोपिया का खतरा कम पाया गया।
एम्स के बाल एवं किशोर मनोचिकित्सक डा. राजेश सागर के अनुसार लंबे समय तक स्क्रीन देखने वाले बच्चों में अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर (एडीएचडी) जैसे लक्षण और एंग्जायटी की शिकायतें देखी जा रही हैं।
बच्चों में बेचैनी, चीजें भूलने, एकाग्रता में कमी और दोस्तों के साथ टिककर न रह पाने जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।
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कहाकि इन्हीं बातों को लेकर नोएडा और ग्रेटर नोएडा के स्कूलों में गौतम बुद्ध नगर प्रशासन ने प्राथमिक कक्षाओं में स्क्रीन के उपयोग को अधिकतम 30 मिनट और अपर प्राइमरी में 60 मिनट तक सीमित कर दिया है। इसके बाद यह मामला दिल्ली में भी चर्चा में बना हुआ है। अभिभावक इसे लेकर चिंतित हैं और जानकारी हासिल कर रहे हैं।
दिल्ली में 45 लाख बच्चे, 1935 सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लास
दिल्ली में 5643 स्कूलों में करीब 45 लाख बच्चे पढ़ते हैं। 2688 सरकारी स्कूलों में करीब 72 प्रतिशत यानी लगभग 1935 में कार्यशील स्मार्ट क्लासरूम हैं। प्ले-ग्रुप और प्री-प्राइमरी कक्षाओं में भी कहानी, कविता, खेल और अन्य गतिविधियों के वीडियो बड़ी स्क्रीन पर दिखाए जा रहे हैं।
इससे छोटी उम्र से ही बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ने की चिंता है। शिक्षाविद प्रोफेसर हंसराज सुमन के अनुसार बढ़ता स्क्रीन टाइम केवल आंखों और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि पढ़ाई पर भी असर डाल रहा है।
शिक्षाविद पंकज गर्ग के अनुसार तकनीक पढ़ाई का सहायक माध्यम है, लेकिन जब स्क्रीन किताब और शिक्षक से सीधे संवाद का विकल्प बनने लगे तो बच्चों की सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। उनके अनुसार स्क्रीन टाइम और पढ़ाई के बीच संतुलन जरूरी है।
कोविड के दौरान व्यवस्था सुचारू रखने के लिए तकनीक पर निर्भरता बढ़ी थी पर, स्कूल खुलने के बाद भी स्क्रीन के उपयोग को कम नहीं किया गया। प्रो. डा. राजेश सागर बताते हैं कि बच्चों को इस समस्या के बचाने के लिए अभिभावकों की उनसे बातचीत, रचनात्मक गतिविधियां, खेल और संतुलित स्क्रीन टाइम आवश्यक है।
