विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

सत्य निकेतन हादसा: पीजी के नाम पर कब तक बिकती रहेगी छात्रों की जिंदगी? जवाब मांग रहे कई बड़े सवाल

Published: Wed, 16 Sep 2026 06:16 PM (IST)Updated: Wed, 16 Sep 2026 06:20 PM (IST)

सत्य निकेतन पीजी हादसे ने छात्रों की सुरक्षा और अवैध पीजी कारोबार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह घटना ...और पढ़ें

भ्रष्टाचार, मुनाफे की इसी अंधी दौड़ ने समाज के ही बड़े वर्ग को पीजी के नाम पर अवैध कारोबार के लालच में मौत के मुंह धकेल दिया है। एआई इमेज

भ्रष्टाचार, मुनाफे की इसी अंधी दौड़ ने समाज के ही बड़े वर्ग को पीजी के नाम पर अवैध कारोबार के लालच में मौत के मुंह धकेल दिया है। एआई इमेज

HighLights

  1. सत्य निकेतन पीजी हादसे में सात लोगों की मौत।

  2. अवैध बहुमंजिला पीजी और भ्रष्टाचार का मकड़जाल उजागर।

  3. सरकारी अनदेखी, शिक्षा बजट में कटौती से छात्रों का शोषण।

मनु त्यागी, नई दिल्ली। लालच के मलबे में तब्दील होता हमारा समाज। इस वाक्य को पढ़कर आपको विचलित होना चाहिए कि आप और हम सभी इसी समाज का हिस्सा हैं, लेकिन भ्रष्टाचार, मुनाफे की इसी अंधी दौड़ ने समाज के ही बड़े वर्ग को मौत के मुंह धकेल दिया है। सत्य निकेतन में पीजी हादसे में पांच छात्रों सहित सात की मौत हमारे सिस्टम के मुंह पर ही तमाचा है।

वह बात अलग है कि हम उसे किस दृष्टि से देख पा रहे हैं, क्योंकि यह तो सर्वविदित है कि ऐसे हादसे भी सरकारी व्यवस्था, एजेंसियों को चेता नहीं पा रहे हैं, इसीलिए बार-बार इन घटनाओं के बाद सामाजिक शोर, सरकारी दिलासाएं, विभागों की कथित कार्रवाई के साथ फाइलें बंद हो जाती हैं। लेकिन क्यों? और ऐसा कब तक? इस सवाल को समाज के प्रति जिसकी जिम्मेदारी है, जो सिर्फ वोट के आधार पर सत्तासीन हो जाते हैं, उनसे पूछना होगा।

सत्य निकेतन के जिस इलाके में हादसा हुआ, वह देशभर से आने वाले उन छात्रों के भविष्य बनाने वाला ‘आशियाना’ है, जो अपनी आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने संजोकर देश की राजधानी में आते हैं। लेकिन यहां जिस तरह से घटना हुई, उसने सामूहिक चेतना को हिला दिया है। यह हादसा सिर्फ एक आपदा या तकनीकी चूक नहीं थी, बल्कि यह हमारे समाज के उस जर्जर सच की गवाही है जिसे हम अक्सर अनदेखा करते आ रहे हैं।

pg12

अतिरिक्त कमाई

मुनाफे की अंधी दौड़ और इंसानी जान की कीमत इस हादसे का सबसे पहला और वीभत्स सच यह है कि मकान मालिकों और ठेकेदारों के लिए मासूमों की जिंदगी से ज्यादा प्यारी "अतिरिक्त कमाई" बन चुकी है। जिस इमारत को केवल दो मंजिल बनाया जा सकता था, उस पर अवैध रूप से पांच मंजिलें खड़ी कर दी गईं। इतना ही नहीं, जर्जर हो चुकी इस पुरानी इमारत के बेसमेंट की दीवारों को सिर्फ इसलिए तोड़ दिया गया, ताकि वहां नई दुकान या मुनाफा कमाने के और रास्ते बनाए जा सकें।

सत्य निकेतन जैसे और भी ठिकाने हैं, दिल्ली ही नहीं एनसीआर में भी हैं। तंग गलियों की बहुमंजिला इमारतों में दड़बेनुमा कमरों में ठूसे गए छात्रों व युवाओं वाली इस व्यवस्था को पीजी का नाम दे दिया जाता है। लूट खसोट के इस मकड़कजाल में छात्रों और युवाओं की मजबूरी की नींव पर खड़ा पीजी का यह कारोबार दिल्ली में ही 15 से 20 हजार करोड़ से अधिक का है। एनसीआर के शहरों को भी जोड़ लें तो यह 25 से 30 हजार करोड़ रुपये पहुंच जाता है।

दिल्ली में 50 हजार से अधिक अवैध पीजी संचालित हो रहे हैं, जिनमें पांच लाख से अधिक बेड होंगे। प्रत्येक बेड का प्रति माह किराया 15-20 हजार रुपये तक है। यह स्थिति एनसीआर के शहरों के पीजी में भी है। गुरुग्राम में ये चार हजार करोड़ रुपये से अधिक है, जबकि ग्रेटर नोएडा में नालेज पार्क जैसी एक ही लोकेशन में ये कमाई महीने की एक हजार करोड़ तक पहुंच जाती है। इसमें राजनेताओं की मिलीभगत और अधिकारियों का संरक्षण जैसे आरोप भी कहीं न कहीं सच्चाई ही लिए होते हैं।

यह विशुद्ध मुनाफे जैसा ही है, क्योंकि जब काम ही अवैध तरह से हो रहा है तो कमाई भी मुनाफे की ही हुई और मुनाफे की ब्लैक मनी पर भला सरकार को क्या टैक्स जा रहा होगा? लेकिन बड़ा सवाल इसमें ये भी है कि जब सरकार को इसका टैक्स नहीं जा रहा तो, बगैर हादसे हुए सरकार क्यों नहीं जागती है।

ऐसे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना तो उसकी ही जिम्मेदारी है। यदि देश की राजधानी में सरकारी व्यवस्था की ऐसी दशा है तो अन्य राज्यों की स्थिति का अंदाजा अनायास ही हो जाता है। एक तरीके से पीजी के नाम पर पूरे देश में छात्रों और अभिभावकों का शोषण हो रहा है। मजबूरी और मुनाफे के बीच बढ़ता ये अवैध कारोबार बड़े स्तर पर पांव पसार चुका है।

pg13

शिक्षा का घटता बजट

दिल्ली विश्वविद्यालय प्रबंधन पर तो आरोप लग रहे हैं कि साल 2012 के बाद से यहां एक भी छात्रावास नहीं बना है। हां, अभी जब सवाल उठे तो मामूली राहत का बयान डीयू प्रबंधन की ओर से भी आ गया कि बहुत जल्द हास्टल की 5500 सीट बढ़ाई जाएंगी। दिल्ली विकास प्राधिकरण भी अपनी पुरानी इमारतों के द्वार छात्रों के हास्टलों के लिए खोलने की घोषणा कर रहा है। हालांकि ऐसी घोषणाओं का जमीनी जुड़ाव बहुत कम होता है, क्योंकि ये कागजों तक ही सीमित होती हैं।

ऐसा नहीं है कि देश के पास संसाधनों की कमी है, बस शासन की प्राथमिकताओं में शिक्षा, शिक्षक और छात्र नहीं हैं। शिक्षा के बजट को लगातार घटाया जा रहा है। मांग होती रही है कि शिक्षा पर जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च होना चाहिए, परंतु केंद्रीय बजट का यह अब लगभग ढाई प्रतिशत रह गया है।

वर्ष 2013-14 में शिक्षा मद में कुल बजट की 4.6 प्रतिशत राशि आवंटित हुई थी, वह घटते-घटते 2026-27 में 2.6 प्रतिशत रह गई है। दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा पूर्ण वित्त-पोषित कालेजों के लिए 2023-24 में 400 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जो 2025-26 में घटकर 325 करोड़ रह गए। इसी तरह, दिल्ली विश्वविद्यालय का भी बजट घटा दिया गया।

PG-infograph

पीपीपी पर पीजी क्यों नहीं?

इस समय आप देख लें, देश में अधिकांश व्यवस्था, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप माडल यानी पीपीपी पर जा रही हैं तो फिर पीजी क्यों नहीं? इसके लिए सब नियम तय क्यों नहीं हो सकते। सरकारी तंत्र और मुनाफाखोरों की मिलीभगत की आड़ में युवाओं की जिंदगी से खिलवाड़ भी बंद होगा और राज्यों की अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिल सकेगा। पारदर्शिता का माॅडल स्थापित होगा।

यह काम तो विश्वविद्यालय और राज्य अपने स्तर पर कर ही सकते हैं। कोई पहल तो करे, देश के लिए नजीर पेश हो सकती है। वे निजी छात्रावासों के मानक, मापदंड और किराये भी तय कर सकते हैं तथा निगरानी का अधिकार भी रख सकते हैं। आज जब छात्र दड़बेनुमा कमरों में अस्वस्थ वातावरण में रहने को मजबूर हैं, तब उन्हें स्वच्छ शैक्षणिक वातावरण कैसे मिलेगा? बहुत से पीजी में सुविधा के नाम पर कुछ नहीं होता है।

अगर हम नई पीढ़ी को उचित वातावरण नहीं देंगे, तो कैसे देश के उज्ज्वल भविष्य के बारे में कल्पना कर सकते हैं? सरकार यदि शिक्षा पर ईमानदारी से ध्यान दे और देश भर के विश्वविद्यालयों और स्कूलों में शिक्षा व सुविधाओं में सुधार करे, तो दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में बाहर के छात्र आएंगे ही क्यों? यह केवल दिल्ली का सवाल नहीं है, हर जगह पीजी के नाम पर छात्रों का शोषण हो रहा है।

आज जो छात्रावास व्यवस्था है, उस पर न विश्वविद्यालय और न ही सरकार का नियंत्रण है। देशभर से जाने कितने युवा छात्र ऐसी जगहों पर आते हैं और खस्ताहाल ठिकानों पर जीते हैं। इससे हमें शर्म महसूस होनी चाहिए। हमें पूछना चाहिए कि एक देश और समाज के रूप में हम क्या कर रहे हैं? हम अगली पीढ़ी को कैसी संस्कृति सौंप रहे हैं? क्या संदेश दे रहे हैं? क्या यही कि भारत में जिंदगी ऐसी ही होती है? अवसरों की इस कमी के इर्द-गिर्द एक पूरा बिजनेस-इकोसिस्टम खड़ा हो गया है।

जिस युवा शक्ति के बूते 2047 के विकसित भारत के सपने देखे जा रहे हैं, अब उसकी मजबूरी, हताशा किसी के लिए एक उद्योग बन गया है। अब आप इसे मानवीयता कहेंगे, समाज कहेंगे या मुनाफा कमाने वाले ‘यमराज’। यह आप ही को तय करना है कि आपके भीतर से आपकी चेतना कब जागेगी।

हालांकि हादसों से इतर एक स्याह पक्ष यह भी है कि यही युवा यहां से निकल कर अपना भविष्य बनाते हैं, बड़े अधिकारी बनते हैं, लेकिन क्या कभी किसी ने दशकों से चले आ रहे इस पीजी माफिया साम्राज्य पर, भ्रष्टाचार के इस दलदल से मुक्ति पाने का प्रयास किया? इसे खत्म करने का संकल्प लिया? ऐसी नजीर का समाज इंतजार करता है, ताकि देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में रहे।

pg11

सरकारी एजेंसियों की व्यवस्था पर नियंत्रण

जनमानस में प्राय: यह तीखा सवाल पूछा जाता है कि जब आवासीय इलाकों में बिना पिलर के पांच-पांच मंजिला अवैध इमारतें खड़ी हो जाती हैं, कमर्शियल बेसमेंट में बिना वेंटिलेशन और फायर एनओसी के मौत के जाल बिछ जाते हैं या सार्वजनिक पार्कों की जमीनों पर रातों-रात दुकानें सज जाती हैं, तब म्युनिसिपल इंस्पेक्टर या जेई कहां होते हैं? क्या उन्हें अपनी आंखों के सामने आकार लेता यह कंक्रीट का अपराध दिखाई नहीं देता?

इसी वर्ष दिल्ली से लेकर लखनऊ तक के हुए पीजी हादसों और अब दिल्ली के सत्य निकेतन में पीजी वाले घटनाक्रम तक एक खुले भ्रष्टाचार की गवाही ही तो हैं। और इस अनदेखी का अपना एक बाकायदा ‘सुव्यवस्थित अर्थशास्त्र’ है। दिल्ली-एनसीआर में भ्रष्टाचार का चरित्र अन्य शहरों से गुणात्मक और संरचनात्मक रूप से पूरी तरह भिन्न है। यहां का भ्रष्टाचार एक बहु-स्तरीय, संस्थागत तरीके से फलने-फूलने वाला एक ऐसा सिंडिकेट है, जहां कोई एक संस्था कभी भी संपूर्ण रूप से दोषी सिद्ध नहीं की जा सकती।

हर हादसे के बाद मौत का ठीकरा एक विभाग दूसरे पर मढ़कर सुरक्षित बच निकलता है। यह इस बात का अकाट्य साक्ष्य है कि जब तक हम इस बीमारी के मूल ढांचे और उसकी आर्थिक रीढ़ को नहीं तोड़ेंगे, ऊपरी तौर पर की गई सीलिंग या बुलडोजर की कार्रवाई केवल मवाद को त्वचा के नीचे दबाने जैसी अस्थायी, दिखावटी राहत जैसी दिखती रहेंगी और मासूम नागरिकों की जान ऐसे ही जाती रहेगी।

वैसे भी देश में कब से सिंगल विंडो सिस्टम, सरकारी एजेंसियों के एकीकरण की बात हो रही है, एक देश एक चुनाव की दिशा में हुंकार भरी जा रही है, लेकिन जहां भ्रष्टाचार पर अंकुश को सबसे पहले सरकारी एजेंसियों की व्यवस्था पर नियंत्रण की जरूरत है, उस दिशा में सिर्फ सुझावों का ही दौर दशकों से चला आ रहा है।

यह भी पढ़ें- जंतर-मंतर पर शिक्षा सुधार की मांग या सियासी तमाशा? रील्स, भीड़ और राजनीति के शोर में दबी छात्रों की आवाज

यह भी पढ़ें- बदलती सरकारें और बदलता इतिहास, बच्चों के भविष्य से यह कैसा खिलवाड़?