जागरण संवाददाता, नई दिल्ली :

लाल किला में पुतला बनाने वाले मो. कामिल का परिवार तीन पीढि़यों से इस काम में तन्मयता से जुड़ा हुआ है। गाजियाबाद के फरुखनगर निवासी कामिल और अब्दुल कादिर ने बताया कि उनके दादा मोहम्मद इलियास ने 65 साल पहले पुरानी दिल्ली की राम लीलाओं के लिए पुतला बनाने का काम शुरू किया। उसके बाद इससे उनके पिता आजम अली और वे जुड़े हुए हैं। दोनों भाइयों ने पिता के संग एक माह पहले से रावण, मेघनाद और कुंभकरण का पुतला बनाने में जुटे हुए हैं। कामिल बताते हैं कि वे 15 साल से इससे जुड़े हुए हैं।

आजम अली बताते हैं कि उनके पिता की राम में बड़ी श्रद्धा थी। उन्होंने कहा था कि हम लोग राम से इस जुड़ाव को कभी न छोड़ें। कई पीढ़ी पहले वे मतातंरण कर हिदू से मुस्लिम बने थे। इसलिए वे राम को अपना पूर्वज मानते हैं। आजम अली हिदू-मुस्लिम को अलग-अलग कहने पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि हमारा डीएनए एक है। राम हमारे लिए भी उतने ही पूज्यनीय हैं जितने हमारे हिदू भाइयों के। इसलिए वे इस माध्यम से ही रामकाज से जुड़े हुए हैं। आजम अली अपने गांव में धार्मिक सौहार्द का जिक्र करते हुए बताते हैं कि वे अपने गांव के प्रधान रह चुके हैं और ऐसा बिना हिदू भाइयों के वोट के बिना संभव नहीं था।

पुतला दहन में सीमित होगी लोगों की मौजूदगी

कोरोना दिशानिर्देशों के मद्देनजर इस बार दशहरा उत्सव में सीमित लोगों की ही मौजूदगी रहेगी। रामलीला स्थल पर आम भक्तों को प्रवेश नहीं दिया जाएगा। जिसके पास आमंत्रण पत्र होगा, वहीं इसमें आ सकेगा।

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