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शासन प्रमुख के रूप में पीएम मोदी के 25 साल, जननायक से राष्ट्रनायक तक का सफर

Published: Tue, 06 Oct 2026 11:16 PM (IST)

नरेंद्र मोदी के शासन प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूरे होने पर यह लेख उन्हें 'जननायक' से 'राष्ट्रनायक' तक ...और पढ़ें

प्रेम शंकर झा, आईआरएस।

प्रेम शंकर झा, आईआरएस।

HighLights

  1. नरेंद्र मोदी ने शासन प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूरे किए।

  2. उनकी शासन-पद्धति समस्या, दृष्टि, नीति, क्रियान्वयन और फीडबैक पर आधारित।

  3. नागरिक को विकास प्रक्रिया का सहभागी बनाना उनकी विशेषता है।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। सात अक्टूबर को नरेन्द्र मोदी के शासन प्रमुख के रूप में पच्चीस वर्ष पूरे हो रहे हैं। 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री की शपथ से शुरू हुआ यह सफर 2014 में प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचा।

इसी वर्ष जून में वे देश के सबसे लंबे समय तक लगातार पद पर रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने। तीन बार गुजरात ने उन्हें चुना और तीन बार देश ने। लोकतंत्र में इतनी लंबी निरंतरता को केवल लोकप्रियता से नहीं समझाया जा सकता। लोकप्रियता तो कई नेताओं को मिली है। भारतीय राजनीति ने ऐसे अनेक जननायक देखे हैं, जिन्होंने जनता की भावना को स्वर दिया और उसकी पीड़ा को सड़क से सदन तक पहुंचाया।

यह परंपरा सम्मान की हकदार है, पर जननायक का काम मूलतः जनता की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करना है। राष्ट्रनायक का काम उससे आगे जाता है, वह जनता की आज की मांग के साथ राष्ट्र की कल की जरूरत को भी पकड़ता है और उसे पूरा करने की मशीनरी खड़ी करता है।

जननायक और राष्ट्रनायक केवल शब्दों का अंतर नहीं

जननायक और राष्ट्रनायक के बीच का अंतर केवल शब्दों का अंतर नहीं है। जननायक जनता की आकांक्षाओं को आवाज देता है, जबकि राष्ट्रनायक उन आकांक्षाओं को राष्ट्र की दीर्घकालीन दिशा से जोड़ने का प्रयास करता है।

भारतीय चिंतन में भी राष्ट्र को किसी एक व्यक्ति के नाम से नहीं बांधा गया। वैदिक वाक्य है, “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः”, अर्थात यह भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं। इस दृष्टि में राष्ट्र किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस भूमि, समाज और संस्कृति से जुड़ा सामूहिक दायित्व है, जिसका निर्वाह उसकी संतानों को करना होता है।

नरेन्द्र मोदी के सार्वजनिक जीवन को इसी दृष्टि से देखने पर उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। उन्होंने स्वयं को बार-बार सत्ता के स्वामी के बजाय देश का सेवक और ‘प्रधान सेवक’ कहा है। उनकी शासन-दृष्टि में अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की चिंता इसी भाव का विस्तार है।

उनकी पुस्तक ‘साक्षी भाव’ में व्यक्त पंक्तियां, मुझे तो जगत को भावनाओं से जोड़ना है, मुझे तो सबकी वेदना की अनुभूति करनी है, उनके सार्वजनिक जीवन में सेवा और संवेदना के जिस आग्रह को वे महत्वपूर्ण मानते हैं, उसकी एक साहित्यिक अभिव्यक्ति हैं।

इसे केवल व्यक्तिगत भावुकता के रूप में नहीं, बल्कि उस शासन-दृष्टि के संदर्भ में भी देखा जा सकता है, जिसमें नीति का अंतिम उद्देश्य नागरिक के जीवन में ठोस परिवर्तन लाना है। पिछले वर्षों में भारत के विकास की आकांक्षा भी इसी तरह बदली है।

कल्याण की प्रतीक्षा करने वाले नागरिक से लेकर अपने भविष्य में भागीदारी करने वाले नागरिक तक का यह परिवर्तन नए भारत, आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत की अवधारणाओं में दिखाई देता है। मेक इन इंडिया से लेकर उत्पादन आधारित प्रोत्साहन, किसानों की आय और कृषि से जुड़े नए क्षेत्रों पर जोर, बुनियादी ढांचे के विस्तार तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था तक विकास का दायरा लगातार विस्तृत हुआ है।

आज भारत केवल अपनी आंतरिक जरूरतों को पूरा करने वाली अर्थव्यवस्था नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक उत्पादन, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भूमिका बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस परिवर्तन का एक पक्ष आर्थिक है और दूसरा राष्ट्रीय आत्मविश्वास का है।

भारत की वैश्विक भूमिका का विस्तार, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी बढ़ती सक्रियता, संकट के समय विदेशों में फंसे भारतीयों की सुरक्षित वापसी और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर त्वरित निर्णय लेने की क्षमता ने विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी सामान्य नागरिक की आकांक्षाओं से जोड़ दिया है।

भारतीय सेना की क्षमता, सीमाओं की सुरक्षा और देश के रणनीतिक हितों की रक्षा के प्रश्न अब केवल रक्षा प्रतिष्ठान तक सीमित विषय नहीं रहे, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास के व्यापक विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं।

एक दूसरे के पूरक बने व्यक्ति और राष्ट्र की प्रगति

राष्ट्रनायक होने का अर्थ इसलिए केवल लोकप्रिय होना नहीं है, राष्ट्रनायक वह है जो समाज की वर्तमान आकांक्षाओं को पहचानते हुए उन्हें भविष्य की राष्ट्रीय क्षमता से जोड़ सके, लोगों को केवल सुविधाओं का प्राप्तकर्ता न मानकर राष्ट्र निर्माण का सहभागी बनाए और ऐसी संस्थाएं तथा व्यवस्थाएं खड़ी करने का प्रयास करे, जिनमें व्यक्ति की प्रगति और राष्ट्र की प्रगति एक-दूसरे की पूरक बन जाएं।

नरेन्द्र मोदी के 25 वर्षों को इसी कसौटी पर देखने पर जनसेवा से राष्ट्रसेवा तक की यात्रा का अर्थ अधिक स्पष्ट होता है। मोदी की सबसे बड़ी विशिष्टता उनका जनाधार नहीं, उनकी शासन-पद्धति है। यह पद्धति पांच कड़ियों की एक शृंखला जैसी दिखती है, पहले समस्या की पहचान, फिर उस पर दृष्टि, फिर नीति, फिर क्रियान्वयन पर अटूट ध्यान और अंत में फीडबैक के जरिए निगरानी है। भारत के शासन में इन कड़ियों का एक साथ जुड़ना असामान्य रहा है। इस शृंखला को समझे बिना पच्चीस वर्षों का मूल्यांकन अधूरा रहेगा।

मैंने अपनी पुस्तक माडिफाइड गवर्नेंस में इसी शासन-पद्धति को विस्तार से समझाने का प्रयास किया है। पुस्तक में विभिन्न वर्षों और अलग-अलग क्षेत्रों के उदाहरणों, आंकड़ों और प्रशासनिक अनुभवों के आधार पर यह बताने की कोशिश की गई है कि किसी समस्या की पहचान से लेकर उसके समाधान के जमीन पर उतरने तक शासन की पूरी प्रक्रिया किस तरह बदलती है।

वहां यह भी स्पष्ट होता है कि किसी योजना की सफलता केवल उसके घोषित लक्ष्य से तय नहीं होती है। उसकी वास्तविक कसौटी समस्या की सही पहचान, लक्ष्य की स्पष्टता, नीति की संरचना, क्रियान्वयन की गति और परिणामों से मिलने वाले फीडबैक को अगली कार्रवाई से जोड़ने में होती है। इस दृष्टि से मोदी के 25 वर्षों को केवल योजनाओं की संख्या या सरकारी फैसलों की सूची के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

अलग-अलग क्षेत्रों में दिखाई देने वाली अनेक पहलों के पीछे यदि किसी साझा तत्व को तलाशना हो तो वह शासन को एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखने की यह प्रवृत्ति है, जिसमें समस्या से समाधान, समाधान से परिणाम और परिणाम से फिर अगले निर्णय तक एक चक्र बनता है। माडिफाइड गवर्नेंस इसी बदलाव को समझने का एक प्रयास है।

हमारी प्रशासनिक परंपरा में अक्सर योजना पहले आती रही और समस्या बाद में। किसी विभाग को बजट मिलता, उसके लिए कार्यक्रम गढ़ा जाता और फिर लाभार्थी खोजे जाते। मोदी की पद्धति इसे उलट देती है।

यहां शुरुआत उस समस्या से होती है, जो करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को चुपचाप प्रभावित कर रही थी, पर जिसे देश ने लंबे समय तक स्वाभाविक मान लिया था। खुले में शौच इसका उदाहरण है। दशकों तक इसे गरीबी का हिस्सा माना गया और इस पर चर्चा से बचा गया। रसोई का धुआं भी ऐसा ही था।

इसका सबसे ज्यादा बोझ उन महिलाओं पर पड़ता था, जिनकी आवाज किसी बजट बहस में नहीं पहुंचती थी। बैंक खाता न होना, सरकारी सहायता का बिचौलियों के हाथों कटते जाना, घर तक नल न पहुंचना, बीमारी का खर्च पूरे परिवार को कर्ज में डुबो देना, ये सब समस्याएं पहले से मौजूद थीं, नया यह था कि इन्हें राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में रखा गया।

इसके बाद दृष्टि आती है, दृष्टि का अर्थ यहां नारा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट लक्ष्य है।

"खुले में शौच से मुक्ति” एक तय लक्ष्य था। “हर ग्रामीण घर में नल” तय लक्ष्य है। “हर पात्र परिवार तक पहुंच” की सैचुरेशन वाली सोच भी इसी का हिस्सा है। जब समस्या स्पष्ट हो और लक्ष्य मापा जा सके, तो पूरे तंत्र को एक दिशा मिल जाती है।

भारत में नीतियां बनाने की कोई कमी कभी नहीं रही। असली कमी वह कड़ी रही, जो नीति को नागरिक तक पहुंचाती है। सरकारी फाइलों में बनी योजनाओं और जमीन पर पहुंची सुविधाओं के बीच जो खाई रही, उसे प्रशासक सबसे बेहतर जानते हैं। मोदी की पद्धति में नीति का महत्व तभी माना गया, जब वह क्रियान्वयन से जुड़ी हो।

यहां क्रियान्वयन अंतिम चरण नहीं, बल्कि केंद्रीय चिंता है। इसके कई लक्षण दिखते हैं। लक्ष्य के साथ समय-सीमा तय की जाती है। योजना को केवल सरकारी विभाग का काम न मानकर जनभागीदारी से जोड़ा जाता है।

स्वच्छ भारत इसका उदाहरण रहा, जिसमें शौचालय बनाने के साथ व्यवहार बदलने पर जोर था। जनधन, आधार और मोबाइल की तिकड़ी ने सहायता को सीधे खाते तक पहुंचाने की तकनीकी बुनियाद दी। पचास करोड़ से अधिक खाते केवल एक सरकारी अभियान की संख्या नहीं हैं।

वे उस ढांचे की नींव हैं, जिस पर प्रत्यक्ष लाभ अंतरण खड़ा हुआ और जिस पर आगे चलकर यूपीआई जैसी डिजिटल अवसंरचना भी खड़ी हो सकी। जिस प्रशासक ने कभी भुगतान की कतार में खड़े वृद्ध पेंशनर को देखा है, या छात्रवृत्ति के लिए भटकते छात्र को, वह जानता है कि सहायता का सीधे खाते में पहुंचना कोई छोटा परिवर्तन नहीं है।

यह राज्य और नागरिक के रिश्ते का बदलना है। शासन की सबसे अनदेखी कड़ी निगरानी की है। बहुत सी अच्छी योजनाएं इसलिए दम तोड़ देती हैं कि कोई यह नहीं देखता कि जमीन पर क्या हो रहा है। मोदी की पद्धति की सबसे विशिष्ट बात यह है कि उसमें निगरानी का तंत्र शुरू से जुड़ा रहता है।

प्रगति नाम का मंच इसका उदाहरण है। इसके जरिए प्रधानमंत्री खुद केंद्र और राज्यों के अधिकारियों के साथ अटकी हुई परियोजनाओं और शिकायतों की समीक्षा करते रहे हैं।

जब सर्वोच्च स्तर से किसी परियोजना की प्रगति पूछी जाती है, तो पूरी शृंखला में जवाबदेही का संदेश पहुंचता है। आकांक्षी जिला कार्यक्रम में सौ से अधिक पिछड़े जिलों को स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, वित्तीय समावेशन और बुनियादी ढांचे के संकेतकों पर लगातार आंका गया और उनकी रैंकिंग सार्वजनिक की गई।

इससे जिलाधिकारी के सामने सवाल बदल गया। अब पूछा जा रहा था कि अमुक संकेतक पर आप कहां खड़े हैं और पिछली बार से कितना सुधार हुआ। स्वच्छ सर्वेक्षण ने शहरों को आपस में प्रतिस्पर्धा में डाला। जल जीवन मिशन में गांव-गांव का नल कनेक्शन आंकड़ा सार्वजनिक डैशबोर्ड पर दिखता है।

पीएम गति शक्ति जैसे मंच में विभिन्न मंत्रालयों की ढांचागत परियोजनाओं को एक नक्शे पर जोड़कर देखा जाता है, ताकि एक सड़क के लिए जो काम चाहिए, उसमें दूसरे विभाग टकराएं नहीं। शिकायत निवारण के डिजिटल मंच नागरिक की आवाज को सीधे व्यवस्था तक पहुंचाने की कोशिश हैं।

इसका निचोड़ यह है कि प्रशासनिक मशीनरी में पहली बार निगरानी को आदत नहीं, बल्कि प्रणाली बनाने की गंभीर कोशिश हुई। इसी को हमने ‘माडिफाइड गवर्नेंस’ के रूप में समझने का प्रयास किया है, जहां समस्या, दृष्टि, नीति, क्रियान्वयन और फीडबैक एक ही चक्र के पांच हिस्से हैं।

जननायक और राष्ट्रनायक का एक और फर्क इसी में है। जननायक अक्सर जनता को देता है। राष्ट्रनायक देने के साथ नागरिक को राष्ट्र निर्माण का सहभागी भी बनाता है, क्योंकि राष्ट्र केवल सरकार से नहीं बनता। स्वच्छ भारत में नागरिक से कहा गया कि सफाई केवल सरकारी काम नहीं, सबकी जिम्मेदारी है।

‘गिव इट अप’ अभियान में सक्षम लोगों से रसोई गैस की सब्सिडी छोड़ने का आग्रह किया गया और लाखों लोगों ने उसे छोड़ा। यह केवल किसी योजना का हिस्सा नहीं था, बल्कि नागरिक और शासन के बीच जिम्मेदारी के नए संबंध का उदाहरण था। इसी तरह कई ढांचागत सुधार तात्कालिक उपलब्धि से कहीं आगे के उद्देश्य से जुड़े थे।

दीर्घकालिक विकास का आधार

जीएसटी ने राज्यों की दीवारें गिराकर साझा बाजार को मजबूत किया। दिवाला संहिता ने वित्तीय अनुशासन की नई संस्कृति को स्थापित किया। सार्वजनिक पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर सड़कों, रेलवे और बंदरगाहों में निवेश किया गया। इनके परिणाम वर्षों में आकार लेते हैं और आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक क्षमता को प्रभावित करते हैं। राष्ट्रनायक की दृष्टि का महत्व इसी दीर्घकालिक सोच में दिखाई देता है।

देश के बाहर भी यही सोच दिखती है। जी-20 की अध्यक्षता में वैश्विक दक्षिण की आवाज को आगे रखना, संकट में फंसे नागरिकों की निकासी और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को दुनिया के सामने भारत की क्षमता के रूप में प्रस्तुत करना, इन सबने भारत की भूमिका को उसकी सीमाओं से कहीं व्यापक बनाया है। इस पद्धति के नतीजे आंकड़ों में भी दिखते हैं।

भारत का कुल निर्यात 2013-14 के करीब 466 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में करीब 825 अरब डॉलर हो गया। एफडीआई का प्रवाह पिछले दशक के मुकाबले दोगुने से अधिक रहा। इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन करीब छह गुना बढ़ा, रक्षा निर्यात लगभग चौंतीस गुना और मोबाइल फोन के आयात पर निर्भरता लगभग खत्म हो गई।

राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण पिछले दशक के मुकाबले दोगुने से अधिक हुआ। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी। महिलाओं की श्रम भागीदारी 2017-18 के 23 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में लगभग 42 प्रतिशत पर पहुंची। सरकार का दावा है कि लगभग पच्चीस करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं।

सुविधा से क्षमता: बदलते भारत का नया ढांचा

पच्चीस वर्षों की इस यात्रा का महत्व केवल इन आंकड़ों में नहीं है। इन आंकड़ों के पीछे एक ऐसी शासन-दृष्टि दिखाई देती है, जिसमें सुविधा की पहुंच के साथ अवसर, तकनीक के साथ पारदर्शिता, बुनियादी ढांचे के साथ आर्थिक क्षमता और घरेलू विकास के साथ वैश्विक भूमिका को जोड़ा गया है। उज्ज्वला से लेकर डिजिटल भुगतान तक, जनधन से लेकर जनभागीदारी तक और सड़क से लेकर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला तक, विकास का दायरा लगातार विस्तृत हुआ है।

इसीलिए पच्चीस वर्ष पूरे होने का अवसर केवल पीछे मुड़कर देखने का अवसर नहीं है। यह देखने का भी अवसर है कि एक शासन-पद्धति ने भारत की विकास यात्रा को किस तरह नए पैमाने और नई गति से जोड़ा। स्वच्छ ऊर्जा, हर घर जल, वित्तीय समावेशन, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आधुनिक बुनियादी ढांचा, विनिर्माण, रक्षा उत्पादन, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक कूटनीति, इन सबको एक ही व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि में जोड़ने का प्रयास इस दौर की विशेषता रहा है।

जनसेवा से राष्ट्रसेवा की यह यात्रा अंततः नागरिक और राष्ट्र के संबंध को भी नए अर्थ देती है। नागरिक को केवल सुविधा का लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास की प्रक्रिया का सहभागी मानना इस दृष्टि की महत्वपूर्ण विशेषता है। जब सामान्य नागरिक की आकांक्षा राष्ट्रीय विकास के लक्ष्य से जुड़ती है, तभी व्यक्तिगत प्रगति और राष्ट्रीय प्रगति एक-दूसरे की पूरक बनती हैं।

जननायक से राष्ट्रनायक: 25 वर्षों का सेवाकाल

जननायक जनता की आकांक्षाओं को समझता है, राष्ट्रनायक उन आकांक्षाओं को राष्ट्रीय क्षमता में बदलने का प्रयास करता है। नरेन्द्र मोदी के पच्चीस वर्षों को इस दृष्टि से देखें तो जनसेवा की शुरुआत नागरिक के जीवन को बेहतर बनाने से हुई और उसका विस्तार राष्ट्र की सामूहिक शक्ति को बढ़ाने तक हुआ।

यही जनसेवा से राष्ट्रसेवा की यात्रा है और शायद इसी में जननायक और राष्ट्रनायक का सबसे बड़ा अंतर भी छिपा है। जननायक की पहचान जनता के प्रेम और विश्वास से होती है। राष्ट्रनायक की पहचान इस बात से होती है कि वह उस विश्वास को राष्ट्र की क्षमता में कितना बदल पाता है।

नरेन्द्र मोदी के पच्चीस वर्षों की यात्रा को इसी कसौटी पर देखें तो यह केवल एक राजनीतिक जीवन की कहानी नहीं, बल्कि शासन की बदलती हुई शैली और भारत की बढ़ती हुई राष्ट्रीय क्षमता की कहानी भी है। आज राष्ट्रनायक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बतौर शासन प्रमुख 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं, लेकिन यात्रा अभी जारी है।

 

प्रेम शंकर झा, आईआरएस
(बहुचर्चित पुस्तक माडिफाइड गवर्नेंस के लेखक)