'साझा घर में सास-ससुर के शांतिपूर्ण जीवन का भी ध्यान जरूरी', दिल्ली की अदालत का वैवाहिक विवाद में स्पष्ट आदेश
पटियाला हाउस कोर्ट ने वैवाहिक विवाद में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि घरेलू हिंसा कानून के तहत महिला को ...और पढ़ें

अदालत को महिला के आवास के अधिकार के साथ बुजुर्ग सास-ससुर के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार में भी संतुलन बनाना होगा।
HighLights
साझा घर में रहने का अधिकार असीमित नहीं होता।
पत्नी के आवास और सास-ससुर के शांतिपूर्ण जीवन में संतुलन।
वैकल्पिक आवास देकर पत्नी के अधिकार को सुरक्षित किया जा सकता है।
रीतिका मिश्रा, नई दिल्ली। पटियाला हाउस स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि कि घरेलू हिंसा कानून के तहत महिला को साझा घर में रहने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार उसी घर में हमेशा रहने का असीमित अधिकार नहीं है। अदालत को महिला के आवास के अधिकार के साथ बुजुर्ग सास-ससुर के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार में भी संतुलन बनाना होगा।
वैकल्पिक आवास देकर सुरक्षित किया
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गोमती मनोचा ने यह टिप्पणी वसंत विहार निवासी शिवानी वर्मा की अपील पर की। अदालत ने कहा कि गंभीर वैवाहिक विवाद और परिवार में कई मुकदमे चल रहे होने की स्थिति में सभी का एक ही घर में रहना उचित नहीं है। ऐसे में पत्नी के रहने के अधिकार को वैकल्पिक आवास देकर सुरक्षित किया जा सकता है।
दो सप्ताह में मकान खाली करना होगा
अदालत ने आदेश दिया कि शिवानी को मौजूदा घर से तब तक नहीं निकाला जाएगा, जब तक उनके लिए वैकल्पिक आवास की व्यवस्था नहीं हो जाती। ट्रायल अदालत चार सप्ताह में तय करेगी कि पति को कितना किराया देना होगा। किराया तय होने के बाद पति को छह माह का किराया पहले देना होगा। इसके दो सप्ताह के अंदर पत्नी को मौजूदा मकान खाली करना होगा।
साझा घर में रहने की अंतरिम सुरक्षा भी मांगी
अदालत ने यह भी कहा कि वैकल्पिक आवास मौजूदा घर के स्तर के अनुरूप होना चाहिए। पति ने पहले वैकल्पिक आवास के लिए दो लाख रुपये प्रतिमाह किराया देने की पेशकश की थी। निचली अदालत किराया तय करते समय इस प्रस्ताव को भी आधार बना सकती है।
शिवानी और वेदांता की शादी 2010 में हुई थी। वर्ष 2023 के आसपास दोनों के बीच विवाद बढ़ गया और दोनों एक ही मकान के अलग-अलग हिस्सों में रहने लगे। शिवानी ने घरेलू हिंसा कानून के तहत साझा घर में रहने की अंतरिम सुरक्षा मांगी थी।
बेदखली आदेश का हवाला दिया
हालांकि, महिला अदालत ने वरिष्ठ नागरिक कानून के तहत जारी बेदखली आदेश का हवाला देते हुए यह राहत देने से इनकार कर दिया था। इस पर शिवानी ने सत्र अदालत में अपील की थी। अदालत ने अपील को सीमित रूप से मंजूर करते हुए कहा कि महिला को बेघर नहीं किया जा सकता, लेकिन उसके आवास के अधिकार को वैकल्पिक आवास के माध्यम से पूरा किया जा सकता है।
