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6 मीनारें, मुगल अंदाज और 3 लाख यात्री रोज… ये है दिल्ली का सबसे खास रेलवे स्टेशन

Published: Sat, 19 Sep 2026 09:16 PM (IST)Updated: Sat, 19 Sep 2026 09:26 PM (IST)

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन अपने समृद्ध इतिहास और वास्तुकला के लिए जाना जाता है, जहां 25 सितंबर को एक विशेष ...और पढ़ें

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन । जागरण

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन । जागरण

HighLights

  1. 25 सितंबर को पुरानी दिल्ली स्टेशन पर महोत्सव का आयोजन।

  2. स्टेशन का 1864 से अब तक का समृद्ध इतिहास प्रदर्शित होगा।

  3. मुगलकालीन वास्तुकला और आधुनिक सुविधाओं का संगम है स्टेशन।

संतोष कुमार सिंह, नई दिल्ली। चटख गेरुआ रंग वाली पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की इमारत वास्तुशिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ ही कई बदलाव व इतिहास का साक्षी रहा है। 1864 में छोटे से भवन के साथ शुरू हुए इस स्टेशन की गिनती आज देश के दस बड़े स्टेशनों में होती है। यहां से रोजाना 250 से अधिक ट्रेनों का संचालन होता है और तीन लाख के करीब यात्री पहुंचते हैं।

यात्रियों को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं। इसके एेतिहासिक महत्व को देखते हुए 25 सितंबर को स्टेशन परिसर में स्टेशन महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। रेल मंत्रालय ने दिसंबर तक देश के एेतिहासिक महत्व वाले 103 रेलवे स्टेशनों पर स्टेशन महोत्सव मनाने का निर्णय किया है।

कई कार्यक्रमों का होगा आयोजन

महोत्सव में स्टेशन के इतिहास की जानकारी देने के लिए फोटो प्रदर्शनी, विरासत स्मारिका का अनावरण, स्टेशन के विकास में योगदान देने वाले रेलकर्मियों का सम्मान सहित अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

यमुना पर लोहा पुल के बनने के बाद वर्ष 1866 के अंतिम दिन यहां ट्रेन पहुंची थी। ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी की कोलकता दिल्ली लाइन पर चलने वाली यह पहली ट्रेन थी। इसके साथ ही दिल्ली रेल मार्ग के माध्यम से देश के अन्य शहरों से जुड़ गया था।

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लगभग 40 वर्षों तक छोटे भवन से ही रेल संचालन का काम होता रहा। वर्ष 1893 में स्टेशन की नई इमारत बनाने का काम शुरू किया गया और दस वर्षों में यह बनकर तैयार हुआ। दो प्लेटफार्म के साथ नई इमारत को वर्ष 1903 में आम यात्रियों के लिए खोला गया।

इसे मुगलकाल के प्राचीन वास्तुशिल्प के आधार पर बनाया गया है। यह इस क्षेत्र के अन्य मुगलकालीन एेतिहासिक भवनों जैसे लाल किला व जामा मस्जिद के अनुरूप दिखता है। इमारत में कुल छह मीनार हैं। पहले इस स्टेशन की मुख्य इमारत लाल रंग की थी। वर्ष 2016 में स्टेशन का नवीनीकरण कार्य शुरू हुआ और यहां कई सुविधाएं बढ़ाने के साथ ही इमारत का रंग भी अब गेरुआ कर दिया गया।

सामरिक महत्व को देखते हुए अंग्रेजों ने स्थापित किया था स्टेशन

1852 में ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी के जनक रोनाल्ड मैक डोनाल्ड स्टीफेंस ने कोलकत्ता से प्रयागराज और दिल्ली होते हुए लाहौर तक रेल लाइन बिछाने की परिकल्पना की थी। वहीं, 1857 में स्वतंत्रता की पहली लड़ाई के विफल होने के बाद अंग्रेजों ने एक रणनीति के तहत दिल्ली में रेलवे स्टेशन के लिए इस स्थान का चुनाव किया था।

भविष्य में हिंसक आंदोलन होने पर उसे आसानी से काबू किया जा सके इसे ध्यान में रखकर रेलवे स्टेशन को शहर के बाहर ले जाने के बजाय आबादी वाले स्थान पर बनाने का फैसला किया गया। पहले गाजियाबाद के नजदीक स्टेशन बनाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे सीलमगढ़ और लाल किले के नजदीक बनाने का निर्णय लिया गया।

दिल्ली के राजधानी बनने पर स्टेशन को मिला विस्तार

वर्ष 1931 में दिल्ली के राजधानी बनने के बाद रेलवे स्टेशन का महत्व भी बढ़ गया। इसके विस्तार की योजना बनाई गई। 1934-35 में रेलवे स्टेशन परिसर को विस्तार दिया गया। प्लेटफार्म की संख्या बढ़ाई गई और बिजली के सिग्नल लगाए गए। इसके साथ ही समय-समय पर इसका विकास होता चला गया। इस समय यहां 16 प्लेटफार्म हैं।

इस स्टेशन पर जोरावर सिंह मार्ग की तरफ एक स्टीम लोको शेड था। 15.05.94 में उत्तर रेलवे में भाप इंजन बंद होने के साथ ही स्टीम लोको शेड भी खत्म हो गया उस स्थान पर वर्ष 1995 में रेलवे स्टेशन में प्रवेश के लिए दूसरा प्रवेश द्वार बनाया गया।

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