राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली : हमारा देश सांस्कृतिक विविधता को समेटे हुए है। यहां की कला, संगीत, रंगमंच, नृत्य और फोटोग्राफी में भी कई आयाम छिपे हैं। इनका समसामयिक रूप ही हमारे समक्ष रह गया है, जबकि इनकी प्राचीनता और भी गौरवशाली है। उसे सहेजने की जरूरत है। हमारी संस्कृति सिर्फ वैसी नहीं दिखनी चाहिए, जैसा कि ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने इसे दिखाने की कोशिश की। इसका मूल स्वरूप दुनिया के सामने आना चाहिए। ये बातें सेरेनडिपिटी आर्ट ट्रस्ट के संस्थापक और मुख्य संरक्षक सुनील मुंजाल ने बुधवार को होटल ताज मान सिंह में दैनिक जागरण से बातचीत में कहीं।

हीरो साइकिल समूह से संबंध रखने वाले सुनील मुंजाल ने चार साल पहले इस ट्रस्ट की स्थापना की थी। गत वर्ष गोवा में इसके बैनर तले पहले सेरेनडिपिटी आ‌र्ट्स फेस्टिवल का आयोजन हुआ था, जिसमें 50 से अधिक प्रोजेक्ट पर काम हुआ और एक लाख से अधिक दर्शकों ने हिस्सा लिया। फेस्टिवल का दूसरा सीजन 15 से 22 दिसंबर के बीच गोवा में होगा, जिसमें गोवा सरकार का सक्रिय सहयोग रहेगा। केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय से बातचीत चल रही है। मुंजाल बताते हैं कि इस साल फेस्टिवल का स्वरूप पहले से कहीं बड़ा होगा। 70 प्रोजेक्ट पर काम हो रहा है। देश-विदेश के एक हजार से अधिक कलाकार भाग लेंगे। हस्तशिल्प, संगीत, रंगमंच, नृत्य, खानपान, फोटोग्राफी और विजुअल आर्ट का भी प्रदर्शन होगा। देश की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का प्रयास किया जा रहा है।

गोवा सबसे उपयुक्त स्थल

सुनील बताते हैं कि इस फेस्टिवल पर 5.23 लाख घंटे की मेहनत छिपी है। शुभा मुद्गल और मंजरी निरूला जैसी 14 से 15 शख्सियत हमारे साथ क्यूरेटर के तौर पर काम कर रही हैं। वे नए और पुराने कलाकारों की बेहतरीन प्रस्तुतियां दुनिया के सामने लाने के प्रयास में जुटी हैं। उन्होंने बताया कि गोवा ऐसे फेस्टिवल के लिए सबसे उपयुक्त है। वहां की फिजा ही अलग है। कहीं लोग चित्रों और फोटोग्राफी का अवलोकन कर सकेंगे, तो कहीं कहानी कहने वाले नृत्य का लुत्फ उठा सकेंगे। कहीं वे भारत के उम्दा जायकों का स्वाद लेंगे, तो कहीं रंगमंच की भाव प्रणव मुद्राओं का आनंद ले सकेंगे। फेस्टिवल में शिरकत करने के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। यह भी प्रयास किया जा रहा है कि हर बार गोवा कीकिसी एक धरोहर को संवारा जाए, जिससे कि फेस्टिवल के बाद भी यह लोगों को याद रहे। इससे डिजाइन, आर्किटेक्चर जैसी अनेक विधाएं जोड़ी जाएंगी।

सरकारों की भूमिका रही सीमित

देश की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में सरकारों का भी योगदान होना चाहिए। क्या इस दिशा में कम काम हुआ है? इस सवाल के जवाब में मुंजाल ने कहा कि, पहले यह कार्य राजा-महाराजा करते थे, बाद में यह सरकारों की जिम्मेदारी बन गई। इस दिशा में उतना काम नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था।

Posted By: Jagran