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गाजियाबाद [गौरव शशि नारायण]। दिल्ली से सटे गाजियाबाद के बृज विहार में रहने वाले सात लोगों ने नाले की जहरीली गैस से न सिर्फ अटल ज्योति जलाई, बल्कि अब इस नाले से निकल रही गैस के जरिये गरीबों की रसोई भी जल रही है। यहां पर हर रविवार को गरीब बच्चों के लिए एक समय का भोजन बनता है और उनको प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

दो साल पहले शुरू हुआ कारवां

58 वर्षीय इंजीनियर हेमंत भारद्वाज ने यह कार्य लगभग दो साल पहले शुरू किया था। इसकी प्रेरणा उनको अपने बच्चों को अनन्या और अद्वितीय से मिली। दोनों विज्ञान की छात्राएं रही हैं और अनन्या वर्तमान में शिक्षक हैं और स्पेन में छात्रों को पढ़ाती हैं। छात्रों को अनुपयोगी सामान के जरिये उसको उपयोग करना भी बताती हैं। हेमंत बताते हैं कि उन्होंने यहां साल 1996 में रहने के लिए आए थे उस वक्त यहां पर नाले से बेहद बदबू आती और जहरीली गैस निकलती थी। उन्होंने कुछ समय बाद यूट्यूब पर नाले की गैस से इस्तेमाल करने का तरीका सीखा और फिर यह प्रक्रिया शुरू की।

सात दोस्तों की बन गई टीम

हेमंत बताते हैं कि जब उन्होंने सफर शुरू किया था तो वह अकेले थे, लेकिन इस मुहिम को रंग लाने में रामनिवास, वीरेंद्र नौटियाल, बसंत लाल, देव नौटियाल, बॉबी त्यागी और प्रदीप गुप्ता ने राह को आसान बनाया। सभी लोगों ने अपनी पॉकेट मनी और पेंशन के पैसों से इस संयंत्र को लगाया और नाले की गैस से प्लांट लगाकर अटल ज्योति जला दी गई। प्रदीप गुप्ता लंदन में रहते हैं।

यहां जलती है अटल ज्योति

अटल ज्योति के जरिये शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है और यहां वैसी ही लौ जलती है जैसे की अमर ज्योति जवान इंडिया गेट पर, भले ही इस लौ का रूप बड़ा न हो, लेकिन इनकी देशभक्ति की भावना पर्याप्त है। हेमंत बताते हैं कि शुरुआत में दिक्कत तो आई और कई बार असफल भी हुए, लेकिन अब बीते लगभग एक साल से लगातार यह सिलसिला जारी है।

चार लाख रुपये कर चुके हैं खर्च

करीब दो साल की इस मेहनत के लिए टीम चार लाख से अधिक रुपये खर्च कर चुकी है। इसमें चार बड़े सिलेंडर, पीएनजी की पूरी पाइपलाइन और फिटिंग, अलग-अलग गैस सिस्टम और आग से बचाव के यंत्र भी लगाए गए हैं। तेज गर्मी होने पर नाले से गैस अधिक निकलती है और उस दौरान मीथेन गैस की मात्रा बढ़ जाती है, जो खाना बनाने में उपयोगी होती है। हेमंत बताते हैं कि लगभग 24 घंटे में चार सिलेंडर भर के तीन से चार घंटे की गैस इस्तेमाल की जाती है, यानी एक छोटे परिवार का काम इस गैस से चलाया जा सकता है। इसमें मीथेन, हाइड्रोक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, अमोनिया और अन्य गैस नाले से निकलती हैं। हेमंत बताते हैं कि इस गैस पर 20 से 25 लोगों का खाना आसानी से बन जाता है, जिसको अलग-अलग लोगों में बांटा जाता है।

रामू को भी दी थी ट्रेनिंग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मन की बात कार्यक्रम के जरिये ऊर्जा संचय कर ईंधन बचाने का जिक्र किए जाने के बाद रामू चायवाला चर्चा में आ गया था, रामू चायवाला साइड चार में नाले की गैस से चाय बनाकर परिवार का पालन-पोषण करता था। हेमंत बताते हैं कि करीब तीन साल पहले ही उन्होंने इंद्रप्रस्थ इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों और रामू को इस प्रोजेक्ट की जानकारी दी थी, जिसके बाद यह सपना साकार हुआ।

प्रधानमंत्री के सामने प्रदर्शित करना है सपना

हेमंत बताते हैं कि वह नाले के पानी को शोधित करने का काम भी करते हैं, इसके लिए जामुन की गुठली, रेत और अन्य आयुर्वेदिक दवाओं का इस्तेमाल करते हैं। साथ में गोमूत्र, फिटकरी, कोयला, रेत से पानी को पार करके साफ पानी का इस्तेमाल किया जाता है। इस पानी को गमलों और कार्यों के लिए इस्तेमाल करते हैं। उनकी चाहत है कि वह इस अपनी अनूठी पहल को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भी प्रदर्शित करें। इससे पहले वह इसे कहीं और जगह फिल्म के माध्यम से दिखा चुके हैं, इसके लिए उनको कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

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Posted By: JP Yadav

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