नई दिल्ली [विनीत त्रिपाठी]। भू-माफिया गिरोह की मिलीभगत से मृतक व्यक्ति की पारिवारिक संपत्ति हड़पने के लिए विवाह प्रमाण पत्र बनाने की आरोपित महिला की अग्रिम जमानत की मांग को दिल्ली हाई कोर्ट ने ठुकरा दिया। वहीं, दिल्ली पुलिस ने भी अदालत में महिला की जमानत याचिका का विरोध किया।

न्यायमूर्ति योगेश खन्ना की पीठ ने महिला को राहत देने से इन्कार करते आत्मसमर्पण करने को कहा। पीठ के रुख को देखते हुए आरोपित के अधिवक्ता ने अग्रिम जमानत याचिका वापस ले ली।

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मृतक के परिवार ने दर्ज कराई शिकायत

दिल्ली पुलिस ने अदालत में तर्क दिया कि मृतक व्यक्ति के परिवार द्वारा एक पुलिस शिकायत दर्ज की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि एक भू-माफिया गिरोह आरोपित महिला की मदद से उनकी संपत्ति हड़पने की कोशिश कर रहा है।

2017 में मरने वाले व्यक्ति की पत्नी होने का किया दावा

सितंबर 2017 में मरने वाले व्यक्ति का महिला ने पत्नी होने का दावा किया था और इससे जुड़ा एक विवाह प्रमाण पत्र भी प्रस्तुत किया था, जोकि जाली था। धोखाधड़ी और जालसाजी मामले में अग्रिम जमानत की मांग करते हुए महिला ने तर्क दिया था कि अप्रैल 2007 में राजौरी गार्डन के अखिल भारतीय मानव सेवा संस्थान में उस व्यक्ति से शादी की थी।

महिला ने किए कई झूठे दावे

महिला ने यह भी दावा किया कि नगर पालिका अधिकारियों ने उसे एक जीवित सदस्य प्रमाण पत्र भी जारी किया था। उसने यह भी दावा किया कि उसने ऋषिकेश और द्वारका अदालत में दीवानी मामले दायर किए थे और अदालतों ने दोनों पक्षों को संबंधित व्यक्ति की संपत्तियों के कब्जे और शीर्षक के संबंध में यथास्थिति बनाए रखें।

इस तरह पकड़ी गई महिला की चोरी

अतिरिक्त लोक अभियोजक अमित साहनी ने दलील दी कि विवाह प्रमाण पत्र सत्यापित किया गया है और जिस पुजारी ने उस पर हस्ताक्षर किए हैं, उन्होंने इसकी प्रामाणिकता की पुष्टि की, लेकिन यह बताने में विफल रहे कि विवाह प्रमाण पत्र (अप्रैल 2007 में जारी) पर मुद्रित एक मोबाइल नंबर उस समय काम नहीं कर रहा था।

उन्होंने कहा कि उस मोबाइल नंबर की विशेष श्रृंखला वर्ष 2014 में ही अस्तित्व में आई और ऐसे में विवाह प्रमाण पत्र जाली निकला। उन्होंने कहा कि आरोपित महिला ने जीवित सदस्य का प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए विवाह प्रमाणपत्र का इस्तेमाल किया।

महिला ने मृतक का जाली आधार कार्ड भी पेश किया है। उन्होंने कहा कि महिला के खिलाफ आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और मामले की विस्तृत जांच की जरूरत है, ऐसे में अग्रिम जमानत की अर्जी पर विचार नहीं किया जा सकता।

Edited By: Geetarjun