नई दिल्ली [विनीत त्रिपाठी]। आवश्यक रक्षा सेवा अधिनियम-2021 को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी की कि आवश्यक सेवा होने के बावजूद अगर आप युद्ध के दौरान हड़ताल पर चले गए तो क्या होगा। मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल व न्यायमूर्ति अमित बंसल की पीठ ने कहा कि अगर लोगों की इच्छा है कि आप हड़ताल पर नहीं जा सकते तो याचिकाकर्ता कौन यह कहने वाला कौन है कि एक आवश्यक सेवा होने के बावजूद हड़ताल पर जाऊंगा। पीठ ने उक्त टिप्पणी करते हुए रक्षा व कानून मंत्रालय को नोटिस जारी कर याचिका पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। मामले में अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी।

400 से अधिक पंजीकृत ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रीय महासंघ अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ ने 30 जून, 2021 को लागू हुए आवश्यक रक्षा सेवा अधिनियम-2021 के कई प्रविधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। संगठन की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने दलील दी कि हड़ताल श्रमिकों का हथियार है और इस पर कोई भी प्रतिबंध स्थापित कानून और श्रम प्रथाओं के विपरीत होगा।

हालांकि, पीठ ने कहा कि नए कानून के मद्​देनजर आवश्यक सेवाओं में हड़ताल की पुरानी अवधारणा को जारी रखने का याचिकाकर्ता दबाव नहीं बना सकते हैं। याचिका में कहा गया है कि ओवर-टाइम करने से इन्कार करने, सामूहिक आकस्मिक अवकाश करने जैसे शांतिपूर्ण हड़ताल को अपराधी बनाने में आक्षेपित धाराएं अधिकार का उल्लंघन करती हैं और यह भारत के संविधान के तहत अभिव्यक्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है।

Edited By: Prateek Kumar