नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। दिल्ली में वायु प्रदूषण की एक प्रमुख वजह अभी भी परिवहन सेवाएं ही हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआं राजधानी की हवा में जहर घोल रहा है। इसी के चलते दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर भी कहीं ज्यादा है। आइआइटी कानपुर और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की एक संयुक्त रिपोर्ट में इस स्थिति का बहुत सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। यही रिपोर्ट दिल्ली सरकार की एग्रीगेटर पालिसी ड्राफ्ट का आधार बनी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के पीएम 2.5 में 28 प्रतिशत हिस्सेदारी परिवहन क्षेत्र की ही है।

दिल्ली की हवा में 80 प्रतिशत तक नाइट्रोजन आक्साइड और कार्बन मोनोक्साइड की वजह भी वाहनों का धुआं है। इसमें 37 प्रतिशत योगदान दोपहिया जबकि 43 प्रतिशत कारों का है। ट्रकों की 10 और तिपहिया वाहनों की हिस्सेदारी पांच प्रतिशत तक है। जमीनी स्तर पर भी 36 प्रतिशत धुआं वाहनों का है। इसी नाइट्रोजन आक्साइड के कारण नाइट्रेट और ओजोन का निर्माण होता है।यह रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली देश में निजी वाहनों का भी हब बन रही है। यहां पंजीकृत वाहनों की संख्या 1.33 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है।

आलम यह है कि 2005-06 में प्रति एक हजार लोगों पर 317 वाहन थे जबकि 2019-20 में यह संख्या बढ़कर 643 तक पहुंच चुकी है। फूड डिलीवरी, ई कामर्स, कोरियर वाहन और कैब की संख्या भी सड़कों पर तेजी से बढ़ रही है। 2025 तक इसमें 150 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है।

डीपीसीसी अधिकारियों के मुताबिक वाहनों के धुएं से हो रहे इसी वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए एग्रीगेटर पालिसी का ड्राफ्ट तैयार किया गया है और इस पर 60 दिनों में दिल्ली वालों से अपने सुझाव-आपत्ति देने को कहा गया है। इस पालिसी के तहत राइड एग्रीगेटर्स व डिलीवरी सेवा प्रदाताओं को अगले तीन माह में सभी नए दोपहिया वाहनों में से 10 और सभी नए चार पहिया वाहनों में से पांच प्रतिशत ई वाहनों को शामिल करना होगा। इसके अलावा इनको मार्च 2023 तक सभी नए दोपहिया वाहनों का 50 प्रतिशत और सभी नए चार पहिया वाहनों में से 25 प्रतिशत ई वाहनों को अपनाना होगा। दिल्ली सरकार एनसीआर के अन्य राज्यों को भी यह पालिसी अपनाने के लिए निर्देशित करने को वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) से अनुरोध करेगी।

Edited By: Jp Yadav