नई दिल्ली [सुशील गंभीर]। कोई बिल्डर पैसा लेकर फ्लैट का कब्जा देने के लिए अनिश्चिकाल तक उपभोक्ता को इंतजार नहीं करा सकता। 12 साल गुजर गए, लेकिन अब तक निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट भी ऐसे ही मामले में फैसला दे चुकी है है कि अनिश्चिकाल तक इंतजार करवाना सही नहीं है। उपभोक्ता अपना पैसा उचित ब्याज के साथ पाने का हकदार है। यह टिप्पणी राज्य उपभोक्ता आयोग ने पाश्र्वनाथ डेवलपर्स को सेवा में कोताही बरतने का दोषी पाते हुए की। कंपनी 12 साल में भी ग्रेटर नोएडा में प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर सकी। आयोग ने आदेश दिया कि दिल्ली के शंकर नगर निवासी पंकज गर्ग को पैसा जमा कराने की तिथि से लेकर अब तक 12 फीसद वार्षिक ब्याज के साथ वापस किया जाए। उन्हें उनके 13 लाख 21 हजार रुपये वापस किए जाएं। साथ ही 25 हजार रुपये बतौर मुआवजा भी निर्माण कंपनी अदा करे।

पंकज गर्ग ने दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग में पाश्र्वनाथ डेवलपर्स के खिलाफ केस दायर किया था। शिकायत में कहा गया था कि ग्रेटर नोएडा में बन रहे पाश्र्वनाथ प्रिविलेज के टावर नंबर छह में फ्लैट बुक कराया था। जुलाई 2007 में हुए करार के तहत पहली बार 10 लाख और उसके बाद तीन लाख 21 हजार रुपये दिए। फ्लैट की कुल कीमत करीब 52 लाख रुपये थी और कब्जा 36 माह में मिलना था। 36 माह बाद वह मौके पर गए तो पाया कि उनके टावर का निर्माण शुरू ही नहीं हुआ। वहीं निर्माण कंपनी ने आयोग में दलील दी कि अनुबंध में ऐसा नहीं लिखा था कि 36 माह में फ्लैट जरूर मिल जाएगा, हालांकि इस समय तक मिलने की संभावना जताई गई थी। उसने दूसरी दलील दी कि प्रोजेक्ट को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। प्रॉपर्टी के बाजार में मंदी आ गई और निर्माण पूरा नहीं हो सका।

बिल्डर को 12 फीसद वार्षिक ब्याज के साथ देना होगा जमा और मुआवजे की रकम

आयोग ने सुनवाई के दौरान पाया कि अगर उपभोक्ता बिल्डर को पैसा चुकाने में देरी करे तो 24 फीसद वार्षिक ब्याज के साथ अदायगी करनी पड़ती है। जबकि बिल्डर ने अनुबंध में लिखा है कि अगर फ्लैट का कब्जा देने में देरी हुई तो जमा कराए गए पैसे पर 1.5 फीसद वार्षिक ब्याज दिया जाएगा। आयोग ने कहा कि यह एकतरफा और अनैतिक अनुबंध है। इसके बावजूद लंबे समय तक फ्लैट न देना न सिर्फ सेवा में कोताही बरतना है, बल्कि अनैतिक व्यापार का एक नमूना है।

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Posted By: JP Yadav

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