नई दिल्ली [विष्णु शर्मा]। बहादुर शाह जफर के समय दिल्ली बहुत बड़े बदलाव से गुजरी थी। राज मुगलों का था, लेकिन सरपरस्ती अंग्रेजों की थी, तो ऐसे में लोग समझ नहीं पा रहे थे कि मुगलों से वफादारी दिखाएं या अंग्रेजों से, उर्दू और फारसी को तबज्जो दें या फिर अंग्रेजी को। हिंदी हिंदुस्तानी के रूप में जिंदा थी, और देवनागरी को तो भूल ही जाइए। तभी तो लक्ष्मी नारायण नेहरू खुद जहां ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए काम करते थे तो बेटा गंगाधर नेहरू मुगल दिल्ली का कोतवाल बना। जो नेहरू परिवार के मुताबिक मोतीलाल नेहरू के पिता थे। संक्रमण के इस दौर में ही दिल्ली में प्रख्यात गणितज्ञ हुए मास्टर रामचंद्र। तब उनकी गिनती गालिब, जौक, हाली, नाजिर अहमद, मुकंद लाल जैसे नामचीनों में होती थी।

एक दौर में हिंदू खासतौर पर कायस्थ उन पर गर्व करते थे कि रामचंद्र मुगल राज में सबसे बड़े गणितज्ञ थे, फिर वो दौर आया जब मुस्लिम उनसे खुश रहने लगे क्योंकि उन्होंने दिल्ली कॉलेज में पढ़ाते हुए उर्दू के 2 जर्नल सम्पादित किए और तमाम विषयों की किताबों का अनुवाद उर्दू में किया। ईसाई उनसे खुश थे क्योंकि वो कई मामलों में हिंदू-मुस्लिम दोनों के अंधविश्वासों को गलत बताने लगे और एक दिन दोनों उनसे बेहद दुखी हो गए, जब वो ईसाई बन गए। आज आलम ये है कि मिशनरियों की कई किताबों में रामचंद्र की चर्चा है, तो अक्सर मुस्लिम इतिहासकार उनकी उर्दू किताबों के पन्ने ट्वीट करते हैं।

रामचंद्र से हिंदू-मुसलमान तब भी नाराज हो गए, जब रामचंद्र ने एक लेख में धरती के इर्दगिर्द ब्रह्मांड को मानने वाले उनके सिद्धांतों की आलोचना की। हालांकि, हिंदुओं में ‘सूर्य सिद्धांत’ और वराह मिहिर की ‘पंचसिद्धांतिका’ इसे काफी पहले नकार चुकी थी। इधर, सैयद अहमद खान ने जवाबी लेख लिखकर इस्लामिक अवधारणा को सही कहा।

रामचंद्र के पिता राय सुंदरलाल माथुर रामचंद्र के जन्म के समय पानीपत में नायाब तहसीलदार थे, यूं दिल्ली के रहने वाले थे, वहां से वापस दिल्ली ही आ गए। 1831 में उनकी मौत हो गई। तब 10 साल के रामचंद्र के 5 छोटे भाई भी थे, दहेज के लिए उनकी शादी मां ने अगले ही साल एक मूक बधिर लड़की से कर दी। 1833 में रामचंद्र ने दिल्ली के इंग्लिश गर्वनमेंट स्कूल में दाखिला ले लिया। अगले 6 सालों में गणित से उनकी दोस्ती हो गई। रामचंद्र का स्कूल अंग्रेजों के उस दिल्ली कॉलेज का हिस्सा था, जिसे अंग्रेजों ने अजमेरी गेट के बाहर गाजीउद्दीन के मदरसे की जगह 1824 में बनाया था, 30 रुपए महीने की स्कॉलरशिप के जरिए रामचंद्र ने पढ़ाई पूरी की और उसी कॉलेज में 1844 में गणित-विज्ञान के अध्यापक बन गए, कॉलेज के ओरियंटल ल्रर्निंग विभाग में, आज इसे जाकिर हुसैन कॉलेज के नाम से जाना जाता है।

मुगल राज में उनकी शुरूआती पढ़ाई उर्दू-फारसी में ही हुई थी। कहा जाता है कि गालिब के पत्रों और सैयद अहमद खान के लेखों पर उनका असर था। बहुत लोग उन्हें उर्दू पत्रकार के तौर पर याद रखते हैं। दिल्ली कॉलेज के प्रिंसिपल ने वर्नाकुलर ट्रांसलेशन सोसायटी बनाई थी, रामचंद्र उससे जुड़ गए, तमाम विषयों-भाषाओं की किताबें उर्दू में अनुवाद होने लगीं।

रामचंद्र ने गणित की कई किताबों का अनुवाद हिंदी में किया। दो किताबें अंग्रेजी में लिख भी डालीं, एक थी- ‘ए ट्रीटिज ऑन प्रॉब्लम्स ऑफ मैक्सिम एंड मिनीमा सोल्व्ड बाई एलजेब्रा’। लघुत्तम-महत्तम की इस अवधारणा के जरिए रामचंद्र ने गणित के काफी नए-आसान फॉर्मूले गढ़ दिए। दिल्ली कॉलेज से ही अंग्रेजों ने एक तरह से दिल्ली को अपने रंग में रंगने की शुरुआत की, पहले उर्दू अनुवाद और इंगलिश एजुकेशन के जरिए, फिर वहां के टीचर्स रामचंद्र और चमन लाल को 1852 में ईसाई बनाकर।

रामचंद्र ने अपनी डायरी में विस्तार से लिखा है कि उनको ईसाई बनाने के कितने साल से प्रयास चल रहे थे। मैथ्यू जे कुइपर ‘दा’वा एंड अदर रिलीजंस’ में लिखते हैं, ‘’1852 में दिल्ली कॉलेज ने धर्मान्तरण का खौफ देखा, हिंदू-मुस्लिमों ने कॉलेज से अपने बच्चे निकाल लिए, पहली बार मुस्लिमों को लगा कि धर्म पर खतरा है”, 1857 की क्रांति में इस डर का भी योगदान बताते हैं।

वहीं, रामचंद्र के लिए रास्ते खुलते चले गए, कलकत्ता में खारिज हुई किताब लंदन में छपी, सरकारी अवॉर्ड भी मिला। रामचंद्र ने डायरी में लिखा कि कलकत्ता में हर अखबार ने उनकी किताब की बुरी समीक्षाएं लिखीं, उन्होंने उन अंग्रेजी अधिकारियों के बारे में भी लिखा है, जिनकी वजह से वो किताब लंदन जा पाई, रामचंद्र के लिए ये जिंदगी का सबसे अहम पल था। उनके ईसाई बनने की ये सबसे बड़ी वजह बन गया। लेकिन, 1857 में जिस तरह गंगाधर नेहरू को परिवार सहित आगरा भागना पड़ा, रामचंद्र की भी जान मुश्किल से बची और ‘फ्रंटीयर ऑफ फीयर’ में डेविड एल गोसलिंग लिखते हैं कि, ‘’अंग्रेजों ने उन्हें रुड़की के थॉमसन इंजीनियरिंग कॉलेज में नौकरी दे दी’’। फिर दिल्ली में एक अंग्रेजी स्कूल के हेडमास्टर बन गए, लेकिन जनता उनसे नाराज ही रही, फिर वो पटियाला के महाराज की नौकरी में चले गए। 1857 के गुस्से का नुकसान उनके कॉलेज को भी हुआ, क्रांति के मतवालों ने कॉलेज में काफी तोड़फोड़ मचाई। फिर दोबारा ये कॉलेज पुरानी प्रतिष्ठा दशकों तक नही देख पाया।

Edited By: Prateek Kumar