नई दिल्ली [लोकेश चौहान]। दिल्ली स्टेट इंडस्ट्रियल एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलमेंट काॅरपोरेशन (डीएसआइआइडीसी) क्षेत्र में औद्योगिक भूखंड का आवंटन कराने के नाम पर कई लोगों से करीब आठ करोड़ रुपये की ठगी करने वाले जीजा और साले को दिल्ली की कनॉट प्लेस थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया है। आरोपितों की पहचान उत्तराखंड के देहरादून के पेसेफिक गोल्फ एस्टेट निवासी विक्रम सक्सेना और उत्तर प्रदेश के सहारानपुर निवासी मुदित कुमार उर्फ मिथुन भटनागर के रूप में हुई है।

दिल्ली के पटियाला कोर्ट में की थी प्रैक्टिस

विक्रम मुदित का साला है। मुदित ने लॉ की पढ़ाई पूरी करने के बाद बार काउंसिल ऑफ इलाहाबाद में सदस्य के रूप में पंजीकरण कराया था। ढाई वर्ष प्रैक्टिस करने के बाद उसने दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में कुछ दिन प्रेक्टिस की थी। दोनों के पास से ठगी के पैसों से खरीदी गई दो कार बरामद की गई है। पांच लाख रुपये की पाॅलिसी और बैंक खाते को सीज किया गया है। खाते में दस लाख रुपये थे। इसके अलावा पुलिस को ठगी के पैसों से डेढ़ करोड़ रुपये के फ्लैट के बारे में जानकारी मिली है।

तीन करोड़ रुपये की ठगी के अलग-अलग मामले दर्ज

डीसीपी डॉ. ईश सिंघल ने बताया कि कनॉट प्लेस थाने में मनोज गुप्ता, राजकुमार मित्तल, मनोज कुमार अग्रवाल और अशोक कुमार ने विक्रम और मुदित के खिलाफ करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये की ठगी के अलग-अलग मामले दर्ज कराए थे। चारों लोगों से नकदी और विक्रम द्वारा बनाई गई फर्जी कंपनी के नाम से चेक लिए गए थे।

टीम बना कर हुई गिरफ्तारी

एसीपी सिद्धार्थ जैन के निर्देशन में एसएचओ आइके झा के नेतृत्व में एसआइ नरेश कुमार और अमित कुमार सहित कई पुलिसकर्मियों की टीम बनाई। मामले की जांच में यह पता लगा कि विक्रम मास्टरमाइंड है। दिल्ली-एनसीआर में दर्जनों जगह छापेमारी के बाद भी दोनों में से किसी को पकड़ा नहीं जा सका। लंबे प्रयास के बाद पुलिस टीम ने 20 जुलाई को विक्रम को देहरादून से दबोच लिया। पूछताछ के बाद उसके जीजा मुदित को भी गिरफ्तार कर लिया गया।

ऐसे करते थे ठगी

पूछताछ में विक्रम ने बताया कि वर्ष 2006-07 में वह दिल्ली में एमसीडी कार्यालय के पास निजी एजेंट का काम करता था। उसने डीएसआइआइडीसी साइटों के आवंटन के बारे में खूब जानकारी जुटाई। इसके बाद उसने लोगों को ठगने के लिए देव सेवा आय विकास कंपनी डीएसआइडीसी के नाम से फर्जी कंपनी बनाकर अपने और दूसरे सहयोगियों के फर्जी पहचान पत्र बनाए। इस बीच उसे पता चला कि डीएसआइआइडीसी ने वर्ष 1996 में औद्योगिक भूखंडों के आवंटन को अस्वीकार करने वाले लोगों को भूखंड का आवंटन कराने के नाम पर ठगी करने की साजिश रची। उसने अस्वीकृति आवेदकों की सूची विभाग की वेबसाइट से लेकर आवेदकों से संपर्क करना शुरू किया। उसी समय उसने कपिल मारवाह, अजय सक्सेना और मुदित उर्फ मिथुन भटनागर को साजिश में शामिल किया। ये तीनों आपस में रिश्तेदार हैं। 

डील फाइनल होने के बाद पैसे दिल्ली में करते थे जमा

विक्रम खुद को डीएसआइआइडीसी के कर्मचारी और अपने सहयोगी अजय सक्सेना, कपिल मारवाह और मुदित को अपना वरिष्ठ अधिकारी बताता था। डील फाइनल करने के बाद वे सेवा शुल्क, डीएसआइआइडीसी शुल्क और औद्योगिक भूखंडों की लागत आदि के लिए पैसे मांगते थे। उन्होंने पीड़ितों को बताया कि क्योंकि आवंटन 1996 के आवेदन के आधार पर होगा, ऐसे में डिमांड ड्राफ्ट डीएसआइआइडीसी के बजाय डीएसआइडीसी के नाम से होगा। डिमांड ड्राफ्ट को वे दिल्ली के राजौरी गार्डन स्थित इंडसइंड बैंक में जमा करते थे।

कई लोगों को दिया धोखा

पीड़ितों का भरोसा जीतने के लिए वे पीड़ितों से मिलने वाले भुगतान के खिलाफ रसीद देते थे और उन्हें अपनी पसंद के प्लॉट नंबर चुनने का विकल्प भी देते थे। इस तरह से चारों ने मिलकर कई व्यक्तियों को धोखा देकर करीब 08 करोड़ रुपये की ठगी की है।

Posted By: Prateek Kumar

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