नई दिल्ली [राहुल चौहान]। एक ओर वैश्विक महामारी कोविड-19 के शुरुआती दौर में लॉकडाउन के दौरान देश-दुनिया के पहिये थम गए थे और दुनिया दहशत में थी तो दूसरी और दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (डीटीयू) की टीम इस दौरान प्रदूषण को लेकर शोध में जुटी थी। डीटीयू कुलपति प्रो. योगेश सिंह के अनुसार कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा 24 मार्च से 31 मई के बीच चार चरणों में लॉकडाउन किया गया था। इसी दौरान डीटीयू की एक विशेष टीम ने सड़क किनारे प्रदूषण को लेकर एक विशेष अध्ययन किया। 

कुलपति ने बताया कि इस शोध में साबित हुआ है कि प्रदूषण के मामले में मानव शरीर पर अधिक बुरा प्रभाव डालने वाले नैनो कणों के उत्सर्जन में वाहनों का अधिक योगदान है। प्रो. सिंह के अनुसार डीटीयू के पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. राजीव कुमार मिश्रा ने अपनी टीम के साथ लॉकडाउन के दूसरे चरण से लेकर अंतिम चरण (चौथे चरण) तक एक अध्ययन किया। इस अध्ययन के दौरान यूएफपी यानि अल्ट्राफाइन पार्टिकुलेट मैटर (100 नैनोमीटर से कम व्यास के कण) और यूएफपी से अधिक को लेकर वायु गुणवत्ता पर लॉकडाउन के प्रभाव का निरीक्षण किया गया। 

उल्लेखनीय है कि पहले और दूसरे चरण में, आपातकालीन स्थिति को छोड़कर, व्यावसायिक और औद्योगिक गतिविधियों के साथ-साथ व्यक्तिगत गतिविधियों पर भी सख्त प्रतिबंध था। लॉकडाउन के तीसरे और चौथे चरण में इन प्रतिबंधों में छूट दी गई थी ताकि शहरों और आसपास के क्षेत्रों में औद्योगिक और वाणिज्यिक गतिविधियों को फिर से शुरू किया जा सके।

डॉ. मिश्रा के अनुसार इस अध्ययन में 10 नैनोमीटर (एनएम) व्यास से लेकर एक माइक्रोमीटर व्यास के आकार वाले कणों के प्रसार की 24 घंटे की निगरानी के आधार पर इनका विश्लेषण किया गया। 100 नैनोमीटर व्यास से कम व्यास वाले कणों (यूएफपी) की मानव अंगों में प्रवेश क्षमता अधिक होने, उच्च सतह क्षेत्र और कण संख्या के कारण इनका मानव स्वास्थ्य पर पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे बड़े कणों की अपेक्षा अधिक बुरा प्रभाव पड़ता है।  

(डॉ राजीव कुमार मिश्रा, सहायक प्रोफेसर पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग, डीटीयू)

उन्होंने बताया कि इस अध्ययन में पाया गया कि 100 नैनोमीटर पार्टिकल व्यास (संचय मोड;> 100 नैनोमीटर से 1000 नैनोमीटर व्यास) वाले कणों का संकेन्द्रण धीरे-धीरे बढ़ रहा था जो कि चरण क्रम के अनुसार आरोही क्रम में अन्य सभी प्रदूषकों की तरह ही था। लेकिन एक दिलचस्प बात यह पाई गई कि 100 नैनोमीटर (यूएफपी) से कम व्यास वाले कण 100 नैनोमीटर से अधिक व्यास वाले कणों की तरह सांद्रता की बढ़ती प्रवृत्ति का पालन नहीं कर रहे थे। उनकी सांद्रता और अस्थायी रूप से भिन्नता लॉकडाउन के दूसरे व उससे आगे के चरणों में बहुत अधिक रही।

उन्होंने बताया कि छोटे कणों (100 नैनोमीटर व्यास से कम) के संदर्भ में, यह निष्कर्ष निकला है कि वाहनों के उत्सर्जन के साथ-साथ प्राकृतिक उत्सर्जन का भी कम प्रदूषित (यानी लॉकडाउन का दूसरा चरण) शहरी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान है, परंतु अत्यधिक प्रदूषित (यानी लॉकडाउन का चौथा चरण) शहरी क्षेत्रों में आमतौर पर ऐसी स्थितियां नहीं देखी जाती हैं। लॉकडाउन के अंतिम चरण में शहरी क्षेत्र में संचय मोड अधिक नज़र आया और 30 नैनोमीटर से 100 एनएम व्यास वाले कणों के उत्सर्जन और संचय मोड में यातायात वाहनों द्वारा उत्सर्जन को महत्वपूर्ण स्रोतों के रूप में पाया गया।

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