मनु त्यागी। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में बीते दिनों तीन राज्यों की पुलिस के बीच जैसा ‘महाभारत’ छिड़ा, उसे पूरे देश ने देखा। इस घटना के बाद से एक विचार यह भी मन में उठ रहा है कि क्या पुलिस स्वयं को इसी प्रकार से पंगु बनाए हुए रहना चाहती है? क्या ऐसे मामलों में वह राजनीतिक निर्णयों का प्रतिकार करते हुए अपने विवेक से काम नहीं कर सकती है? नैतिक दायित्व की वर्दी यानी जिम्मेदारी पहनते समय उसके विचार, समाज सुधार और स्वाभिमान को लेकर खूब उद्वेलित होते हैं कि मानो सुरक्षा का कवच समाज के लिए स्थापित हो जाएगा। लेकिन पुलिस सुधार को लेकर आप ‘शोध’ कर लीजिए, देशभर में इसके लिए आवाज उठाने वाला कोई नाम आपको मिलेगा तो वह केवल उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह का ही होगा। प्रकाश सिंह ने पुलिस सुधार के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और वह अब भी जारी है, क्योंकि लगभग डेढ़ दशक पहले सर्वोच्च न्यायालय की ओर से इस दिशा में जो निर्णय आया था, तो 18 राज्यों ने उसका ‘तोड़’ निकालते हुए उसे अपना लिया।

यह विडंबना ही है कि राजनीतिक मंशाओं को पूरा करने के लिए आइपीसी की सभी धाराओं का ‘सदुपयोग’ करने में जुट जाने वाला पुलिस महकमा कभी अपने सुधार के लिए ही आवाज नहीं उठा पाता। न ही आवाज उठाना चाहता है। जब हमारे भीतर से आवाज उठेगी तो निश्चित ही संवैधानिक प्रक्रिया भी कहीं न कहीं विचार के लिए अग्रसर होगी। आखिर लोकतांत्रिक देश के मायने खाकी अपने लिए भी तो निहित करे, ताकि जनता का यह विश्वास पल्लवित हो सके कि वाकई पुलिस अपने हित के लिए अग्रसर है।

चुनाव घोषणा पत्र और पुलिस सुधार : कुरुक्षेत्र में घटित उपरोक्त घटित मामला फिलहाल पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय पहुंच चुका है। उसे इस मामले का निपटारा इस तरह करना चाहिए कि वह नजीर बने और पुलिस के मनमानेपन की गुंजाइश खत्म हो। यह चिंता की बात है कि अब इस दुरुपयोग पर लगाम लगनी चाहिए। जब देश की राजनीति भी नए इतिहास गढ़ रही है तो सरकारें भी पुलिस का इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों और आलोचकों को सबक सिखाने में करने के बजाय समाज के मूलभूत दायित्वों के लिए करने की मिसाल पेश करे। राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्रों में पुलिस सुधार शामिल हो जाए, उस पर अमल भी हो, तो हालात बदल सकते हैं। लेकिन यहां तो देश के बड़े-बड़े राज्यों में डीजीपी की नियुक्ति को लेकर ही राजनीति हो जाती है, चुनाव घोषणा पत्र में ऐसी मिसाल तो बहुत दूर की कौड़ी है।

अभी तो स्थिति यह है कि किसी भी ट्वीट और फेसबुक पोस्ट को आपत्तिजनक बताकर संबंधित व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस भेज दी जाती है। जिस पुलिस को कानून एवं व्यवस्था को गंभीर चुनौती देने वाले तत्वों के खिलाफ सजग रहना चाहिए, वह अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां करने वालों के पीछे पड़ना पसंद करती है। कई बार तो वह ऐसे लोगों को जेल में डालने या बनाए रखने के लिए अतिरिक्त श्रम भी करती है। निसंदेह ऐसा सत्ताधारी लोगों के दबाव में होता है, लेकिन आखिर पुलिस के उच्च अधिकारियों को अपने संवैधानिक दायित्वों की कुछ तो परवाह होनी ही चाहिए?

धीमी चाल : निश्चित रूप से पुलिस सुधार राज्य सरकारों का मसला है और वे कहते भी हैं कि उन्होंने वर्ष 2006 में इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अपने राज्य में इसमें सुधार के साथ लागू भी कर दिया। यह बात अलग है कि इसकी वास्तवकिता आज भी हर राज्य के नागरिकों के समक्ष है। वर्ष 1996 से लेकर 2006 तक की लंबी लड़ाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की आत्मा को ही मार दिया गया। लेकिन क्या जिस तरह से राज्य समाज हित सुधार से जुड़े कई कानूनों में सुधार या समान नागरिक संहिता कानून लाने के लिए प्रेरक पहल कर रहे हैं वे पुलिस सुधार की दिशा में ऐसे कदम उठाकर नजीर बने?

सर्वोच्च न्यायालय के संबंधित फैसले के समय तत्कालीन केंद्र सरकार ने जो किया सो किया, उन सुधारों की दिशा में क्या वर्तमान केंद्र सरकार आगे बढ़ सकी? क्या इसे दिल्ली में लागू करने का प्रयास किया, ताकि अन्य राज्यों को इस दिशा में प्रोत्साहित किया जा सके? राज्यों द्वारा निकाले गए ‘तोड़’ पर भी नजर डाल लेते हैं। पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह द्वारा पुलिस सुधार की वर्ष 1996 से लड़ी गई लंबी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एक अध्ययन कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव (सीएचआरआइ) ने किया था। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2006 के बाद केवल 18 राज्यों ने नए पुलिस एक्ट को पारित किया है, जबकि बाकी राज्यों ने सरकारी आदेश/ अधिसूचनाएं जारी की हैं, लेकिन किसी भी एक राज्य ने अदालत के निर्देशों का पूरे तरीके से पालन ही नहीं किया है। इसमें अदालत ने सात बिंदु दिए थे जिसमें किसी भी राज्य का पुलिस सुधार पूर्णत: कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

मानो सर्वोच्च अदालत ने स्टेट सिक्योरिटी कमीशन बनाने को कहा, जिसमें आधे सदस्य सरकार के और आधे स्वतंत्र रखने को कहा। राज्य सरकारों ने आधे तो अपने रख ही लिए, शेष जो स्वतंत्र रखे जाने थे, वे भी सरकार हित वाले रखकर सरकार हितकारी व्यवस्था को तैयार कर लिया। इन सुझावों में प्रमुख बिंदुओं में पुलिस को राजनीतिक कठपुतली से मुक्ति समेत हर राज्य में एक सुरक्षा परिषद का गठन, डीजीपी, आइजी व अन्य पुलिस अधिकारियों का कार्यकाल दो साल तक सुनिश्चित करना, आपराधिक जांच एवं अभियोजन के कार्यो को कानून-व्यवस्था के दायित्व से अलग करना और एक पुलिस शिकायत निवारण प्राधिकरण का गठन आदि है। लेकिन इस दिशा में अब तक कोई कारगर पहल नहीं हो सकी है।

Edited By: Sanjay Pokhriyal