नई दिल्ली, जेएनएन। तंदूर हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व कांग्रेस नेता सुशील शर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद शुक्रवार देर शाम तिहाड़ जेल से रिहा कर दिया गया। सुशील को सेमी ओपन जेल के पास बने मुख्य द्वार के बजाय उस द्वार से निकाला गया, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर प्रशासन से जुड़े अधिकारी करते हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा कालिया की पीठ ने शुक्रवार को उसकी तुरंत रिहाई का आदेश दिया था। सुशील ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उसे 23 साल से जेल में रखा गया है।

याचिका पर सुनवाई करते हुए 18 दिसंबर को हाई कोर्ट ने गृह विभाग सहित अन्य को तलब किया। पीठ ने इस प्रकरण को गंभीर बताते हुए पूछा था कि क्या सजा पूरी होने के बावजूद हत्या के मामले में एक व्यक्ति को लगातार जेल में रखा जा सकता है? पीठ ने कहा कि यह कैदी के मानवाधिकारों का मामला है। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने सजा पूरी कर ली है, इसलिए इसे तुरंत रिहा करना होगा।

बता दें कि एक व्यक्ति से अवैध संबंध के शक में सुशील ने 1995 में पत्नी नैना साहनी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके बाद शव के टुकड़े करके एक रेस्तरां के तंदूर में जला दिया था।

याचिका में क्या कहा
1995 में पत्नी की हत्या के मामले में दोषी सुशील कुमार शर्मा ने याचिका में दावा किया था कि एक अपराध के मामले में समयपूर्व रिहाई 20 साल पर दी जा सकती है।

ऐसे हुआ था खुलासा
एक सब्जी बेचने वाली महिला से पुलिस को मिली सूचना के बाद हत्याकांड का खुलासा हुआ था। महिला ने देर रात रेस्टोरेंट में तेज आग और बदबू को महसूस किया तो पुलिस को सूचना दी। पुलिस पहुंची तो शव तंदूर में जल रहा था। यह पहला मामला था, जिसमें डीएनए जांच और दो बार पोस्टमार्टम कराने की जरूरत पड़ी थी।

अभी क्यों जेल में है शर्मा
जब सुशील शर्मा को उम्र कैद हुई थी, तब हत्या के दोषी को न्यूनतम 14 से अधिकतम 20 साल जेल में रखने का प्रावधान था। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा उम्र कैद का मतलब ताउम्र जेल में रहना होगा। बाद में इस पर विचार राज्यों पर छोड़ दिया गया।

कांग्रेस से जुड़ा रहा था सुशील शर्मा
देश के वीभत्स हत्याकांड में शुमार नैना साहनी हत्याकांड (तंदूर कांड) 90 के दशक में बहुत चर्चित हुआ था। इसकी एक वजह यह भी थी कि इसमें कांग्रेसी नेता सुशील शर्मा का नाम भी जुड़ा था। कुछ महीने पहले उम्रकैद की सजा काट रहे सुशील के जेल से बाहर आने के आसार बन रहे थे, लेकिन समीक्षा बोर्ड ने मनु शर्मा और संतोष सिंह के साथ उसकी अपील को भी खारिज कर दिया था।

वहीं, इससे पहले हुई सुनवाई में न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल ने प्रकरण को गंभीर बताते हुए सजा समीक्षा बोर्ड से पूछा था कि क्या सजा पूरी होने के बावजूद हत्या के मामले में एक व्यक्ति को जेल में रखा जा सकता है?

पीठ ने कहा था कि यह एक कैदी के मानवाधिकारों के उल्लंघन का मामला है, इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा था कि याचिकाकर्ता ने 23 साल की सजा पूरी कर ली है। हत्या अपने आप में नृशंस होती है। अगर हम एक व्यक्ति को लगातार जेल में रखने की अनुमति देते हैं तो फिर हत्या के मामले में किसी भी व्यक्ति की समय पूर्व रिहाई नहीं होगी।

सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के स्टैंडिंग काउंसल राहुल मेहरा ने कहा था कि कैदियों की समय पूर्व रिहाई पर निर्णय उपराज्यपाल लेते हैं। सजा समीक्षा बोर्ड द्वारा सुशील को रिहा नहीं करने की सिफारिश को उन्होंने स्वीकार कर लिया था।

बता दें कि 1995 में पत्‍‌नी की हत्या के मामले में दोषी सुशील ने याचिका में दावा किया था कि एक अपराध के मामले में समयपूर्व रिहाई 20 साल पर दी जा सकती है, जबकि जघन्य अपराध के मामले में यह समयसीमा 25 साल की है। वहीं उनका मामला प्रथम श्रेणी में आता है, इसके बावजूद भी वह 23 साल की सजा काट चुके हैं।

गौरतलब है कि 2 जुलाई, 1995 को कांग्रेस नेता सुशील शर्मा ने अवैध संबंधों के शक में पत्नी नैना साहनी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके बाद उसने नैना के शव को दिल्ली के एक होटल में तंदूर में जलाने की कोशिश की थी। इस दौरान मामला खुल गया और पुलिस ने तंदूर से नैना का अधजला शव बरामद किया था। इसके बाद लंबी कानूनी लड़ाई में अदालत ने सुशील शर्मा को फांसी की सजा सुनाई फिर सुप्रीम कोर्ट ने सजा को उम्रकैद में बदल दिया।

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