नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। दिल्ली के मेहरौली में मई में घटी एक घटना का जब हाल में पर्दाफाश हुआ तो लोग सन्न रह गए। अधिकांश परिवारों में लोग बेटियों व उनके पुरुष मित्रों के प्रति सतर्कता बरतने लगे हैं। दरअसल आज की पीढ़ी ने अपने परिवार से, अपनों से, स्वजन के लिए एक लकीर खींच दी है, जिसके आगे हस्तक्षेप उन्हें बरदाश्त नहीं होता। विशेषकर रिश्तों के प्रति आज की पीढ़ी का बढ़ता अलगाव और नासमझी अपने भविष्य को क्या देगी, इसकी परिकल्पना बहुत विचलित करती है। इन्हें संविधान, अधिकार, कानून की गहरी समझ नहीं है, परंतु परिवार को यह कहने से नहीं चूकते कि उन्हें बोलने और स् तंत्र रूप से जीने का अधिकार है। बाकायदा उम्र का हवाला होता है।

स्वतंत्रता के बदलते मायने : हमारे संविधान की यह विशेषता है और कहें कि उसमें सभी के अधिकारों को लेकर इतनी संजीदगी है कि उसमें सभी की परवाह की गई है। अधिकारों को सम्मान दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के अंतर्गत हमें बोलने की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार के रूप में दी गई है और अनुच्छेद 21 में हमें दी गई जीने की स्वतंत्रता। निश्चित ही हमारे समाज के आकार-प्रकार और उसकी मानवीयता को अंगीकार रखने के लिए ये आवश्यक तत्व भी हैं। लेकिन आज बच्चे माता-पिता, स्वजन से ही ‘स्वतंत्र’ होना चाहते हैं तो उन्हें ही संविधान पढ़ा रहे हैं। ये कितनी ‘अबोध’ युवा भारत वाली पीढ़ी है जो यह भूल बैठी है कि भला अपने भविष्य को कोई स्वतंत्र क्यों नहीं रखना चाहेगा। इस स्वतंत्रता की एक सीमा होती है। मर्यादा होती है, जो हर बेटी के रक्षा कवच के रूप में भीतर-बाहर सब जगह रहना चाहती है। रहना भी चाहिए।

अब इस पीढ़ी का स्वजन से अलग अपना ‘स्पेस’ बनाना उनकी नासमझियों से उनका ही दुश्मन बन रहा है। उसे ही भारी पड़ रहा है। श्रद्धा हत्याकांड। जिस तरह लिव-इन में रह रहे आफताब नाम के उसके कथित साथी ने पहले उसे मारा, फिर 35 टुकड़े किए, उन्हें अलग-अलग ठिकाने लगाया। घटना की परतें छह माह बाद खुलीं तो प्रश्नों से और घिरती चली गईं। कुछ दिन तो हम और आप इसे जेहन में रखेंगे। बड़ा सवाल यह है कि यह घटना हमें कुछ सबक देकर जाएगी या नहीं?

हम इससे सबक लेंगे या नहीं? हमारी समझ को विकसित कर पाएगी या नहीं? रिश्तों के प्रति मिटती श्रद्धा को जगा पाएगी या नहीं? आफताब जैसों का होना किसकी गलती : क्रूर, वहशी, दरिंदा, नरपिशाच तमाम तरह की विचलित करने वाली, हिंसक प्रवृत्ति को परिभाषित करने वाली उपमाओं का संकलन आफताब के लिए टूट पड़ा है। टूटना भी चाहिए। उसका गुनाह, आरोप उसे कब फांसी के फंदे तक लेकर जाएगा, यह तो अभी जांच की भ्रमित करने वाली कड़ियों को जब विज्ञानी परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर अपनी पूर्ण रिपोर्ट सौंपेंगे, उस पर निर्भर करेगा। लेकिन सवाल यह है कि ऐसे कितने आफताब और होंगे।

ये हमारे आसपास ही मौजूद होते हैं, फिर भी समय पर इन विकृतियों को क्यों नहीं पकड़ पाते। क्यों नहीं समझ पाते। इनकी मनोवैज्ञानिकता से हम इतने अनभिज्ञ क्यों रहते हैं। अच्छा हमने कभी स्वयं पर गौर किया कि हम इतना आश्वस्त हो गए हैं कि आसपास क्या हो रहा है, देखना ही नहीं चाहते, हमारे नजदीक से कौन गुजर गया, हम सोचना ही नहीं चाहते, हमने अभी जो दृश्य देखा वह क्या था, उसे लेकर हमारे मन में सवाल क्यों नहीं खड़े होते? हम केवल भविष्य को पकड़ने के लिए भाग रहे हैं, वर्तमान में जो हमारे साथ कदम जमाए आसपास चल रहा है उसे समझने का समय हमारे पास नहीं है। वही क्रूर रूप में जब हमारे पड़ोस से निकलता है तो पांव तले जमीन खिसक जाती है। हम मेट्रो में जा रहे हैं, पास में कौन बैठा है, कभी सोचते हैं? आटो, बस, सड़क पर, जहां भी हैं आपको ही तो देखना है, हम संविधान का हवाला अपने स्वजन को अपनी स्वतंत्रता के लिए दे सकते हैं, लेकिन बतौर नागरिक हमारी भी कुछ नैतिक जिम्मेदारियां हैं, जिन्हें समझा जाना चाहिए।

आफताब का क्रूर रूप बड़े-बड़े अपराध मनोविज्ञानियों के लिए भी शोध का विषय बन गया है। वह कारण, वह मनोवृत्ति उनकी समझ में इसी तरह स्थापित होती दिखती है कि जब हम ऐसे लोगों की शुरुआत की छोटी-छोटी हरकतों की अनदेखी करते रहते हैं, उसे सामान्य मानते हुए चलते हैं, वह सबसे घातक है। शरीर के तसल्लीपूर्वक टुकड़े करना, उन्हें फ्रिज में रखना, एक-एक टुकड़े को सुनियोजित तरीके से जंगलों में ठिकाने लगाना। यह सब कुछ आरोपित अपने दिमाग में पहले ही तय कर चुका था।

न्यूरोसाइंस में अपराधियों के दिमाग पर निरंतर शोध हो रहे हैं। शरीर में जिस प्रकार के जीन की कमी है और ब्रेन में सिकुड़न जैसी कई बातें अब तक के शोध में ऐसे क्रूर, हिंसक मस्तिष्क में निकलकर आई हैं। ऐसी भविष्य के लिए उम्मीदें भी जगाई जा रही हैं कि आगे चलकर इन्हीं संकेतों से संभावित हत्यारे को पहले ही पहचान लिया जाए और उसे ज्यादा संवेदना, ज्यादा प्यार जताते हुए सही रास्ते पर रखा जा सके। ज्यादा संवेदना…। शोध विशेषज्ञों का यह विषय बहुत संवेदनशील है और आज परिवारों की सिकुड़न ही कहीं न कहीं, दिमाग की प्रवृत्ति पर दुष्प्रभाव डाल रही है।

एकल होते परिवार, उनमें भी माता-पिता, बहन-भाई की बातों को, उनकी सलाह को दखल की तरह देखना। या अपने ही सर्किल में, अपनों के ही बीच उनके व्यवहार में होते बदलाव हमारे लिए चिंता का विषय नहीं होते। हमारे समाज का ढांचा कुछ इस तरह परिवर्तित होता जा रहा है कि जब हमारे आसपास कुछ झकझोरने वाला होता है, तब हम सचेत होते हैं। यह बात अलग है कि उसे भी स्मृति से धूमिल होते ज्यादा समय नहीं लगता। श्रद्धा वालकर हत्याकांड कोई दुर्लभ घटना नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हम यह मान बैठे हैं कि यह सब तो बहुत सामान्य होने लगा है। हमें हत्या, किसी के साथ कुछ गलत होना, गलत जैसा ही नहीं लगता। मारपीट तो सामान्य लगता है। इसीलिए डेटिंग एप, इंटरनेट मीडिया से पैदा हो रहे ये रिश्ते, जब एक समय के बाद छोटी-छोटी हिंसा के रूप में आते हैं तो वह ‘चलता है’ कि तरह लेकर आगे बढ़ते हैं।

आए दिन रोज देशभर में सैकड़ों ऐसे मामले आते हैं जिनमें इन डेटिंग एप के रिश्तों के फर्जीवाड़े का पर्दाफाश होता है। विभिन्न इंटरनेट मीडिया साइट्स के रिश्तों का सच उजागर होता है। फिर भी हम इस मकड़जाल में फंसना चाहते हैं, क्योंकि यह सब हमारे लिए अलार्मिंग नहीं है। हम कितने ही जघन्य अपराध देख चुके, उसे कितनी जल्द भूल जाते हैं, इसका उत्तर स्वयं ही दे सकते हैं। इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि जिस तरह से तेजी से डेटिंग एप के माध्यम से दोस्ती हो रही है, फिर वह तेजी से टूट रही है, ये सब रिश्तों की बुनियाद को खोखला बनाते जा रहे हैं। इंटरनेट मीडिया के जाल में आज किसी से प्यार हुआ, कल खत्म हो गया, परसों फिर किसी का साथ हो गया, यह सब कहीं न कहीं स्वजन को बच्चों को दी गई स्वतंत्रता और उसकी मर्यादा के बीच स्वयं को खड़ा करना ही होने के लिए अलर्ट करता है। अन्यथा सामयिक तथ्यों की अनदेखी और नई पीढ़ी का ‘सब चलता है’ जैसे जुमलों के नाम पर हम भविष्य में बहुत खो सकते हैं। स्वजन और वर्तमान युवा पीढ़ी नहीं जागी तो ऐसे आफताब हमारे ही बीच से जन्म लेते रहेंगे। उसके जिम्मेदार भी केवल आप ही होंगे। आखिर यह कैसे भूला जा सकता है कि सनातन संस्कृति, सभ्यता के निर्वाहक आप ही तो हैं।

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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