नई दिल्ली [विवेक शुक्ला]। बेशक, जीवन के किसी भी क्षेत्र में शानदार योगदान देने वाले शख्स के नाम पर सड़कों के नाम हों तो इसका स्वागत होना चाहिए। पर ये सब करते हुए थोड़ा बहुत दिमाग लगा लिया जाए तो सही रहेगा। महज खानापूर्ति ठीक नहीं। गुस्ताखी माफ हो, लेकिन वियतनाम के मुक्तियोद्धा हू-चिमिह्न के नाम पर सड़क नवीन शाहदरा में और जीवनपर्यंत रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाले दक्षिण अफ्रीका के महानायक नेल्सन मंडेला के नाम पर अगर रोहिणी में सड़क होती तो कैसा लगता? जाहिर सी बात है कि यह अच्छा नहीं लगेगा।आप कभी पटेल नगर के गोल चक्कर पर पहुंच जाएं। वहां एक सड़क धर्मदास शास्त्री के नाम पर है। धर्मदास शास्त्री 1984 में दिल्ली में भड़के सिख विरोधी दंगों में सक्रिय थे। उन पर उपद्रवी भीड़ को उकसाने का आरोप था।ऐसे शख्स के नाम पर दिल्ली में सड़क का होना कहीं न कहीं सिद्ध करता है कि यहां खास लोग ही नहीं, खलनायकों के नाम पर भी सड़कों के नाम रख दिए जाते हैं।

'घर' से दूर मधु लिमये मार्ग

मधु लिमये प्रखर चिंतक, विद्वान और सांसद थे। वैसे तो वे मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले थे, लेकिन कई बार बिहार के बांका और मुंगेर से लोकसभा में चुनकर पहुंचे। दशकों राजधानी के वेस्टर्न कोर्ट और पंडारा रोड में रहे। उनके नाम पर एक सड़क चाणक्यपुरी में है। ये बात समझ से परे है कि मधु लिमये के नाम पर सड़क उस जगह पर है, जहां से उनका कोई लेना-देना नहीं रहा। जब वे सांसद नहीं रहे तब सरकार ने स्वतंत्रता सेनानी कोटे से पंडारा रोड पर एक फ्लैट उन्हें आवंटित कर दिया था। उसी में वह पत्नी चंपा के साथ रहते थे। तमाम बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार, राजनीतिक कार्यकर्ता लिमये जी से विचार-विमर्श के लिए वहां आते थे। उनसे मिलने वालों में दिल्ली यूनिवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्रों की भीड़ लगी रहती थी। सन् 1995 में उनकी मृत्यु के बाद पंडारा रोड़ का वह घर खाली कर दिया गया।

समझ से परे है सड़कों का नाम

डॉ. राममनोहर लोहिया के निकट सहयोगी रहे लिमये संसदीय राजनीति के गहरे जानकर थे। चूंकि लोहिया जी को बतौर सांसद गुरुद्वारा रकाबगंज में सरकारी आवास आवंटित हुआ था, इसलिए आगे चलकर विलिंग्डन अस्पताल का नाम बदलकर राम मनोहर लोहिया कर दिया गया। ये बात तो समझ में आती है, पर पंडारा रोड में रहने वाले लिमये के नाम पर सड़क चाणक्यपुरी में होने का कोई मतलब समझ में नहीं आता। उनके नाम पर तो पंडारा रोड या लोधी रोड के आसपास ही किसी सड़क का नाम रखा जा सकता था। 

इसी तरह से दिल्ली की पहली मेयर और भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका अरुणा आसफ अली के नाम पर एक सड़क साउथ दिल्ली के वसंत कुंज में है। यह बात तो सभी जानते हैं कि अरुणा जी महान स्वाधीनता सेनानी आसफ अली की पत्नी थीं। दिल्ली-6 के पुराने लोगों को याद होगा, जब आसफ अली रोड पर एक शराब की दुकान को बंद करवाने के लिए अरुणा आसफ अली ने लंबा धरना दिया था। वह डिलाइट सिनेमा के पीछे लंबे समय तक रहीं। दिल्ली की जनता के सुख-दुख में शामिल होने से कभी पीछे नहीं हटती थीं, लेकिन प्रशासन को उनके नाम पर सड़क वसंत कुंज में ही समझ आई। 

(लेखक जानेमाने इतिहासकार भी हैं)

Posted By: JP Yadav

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