नई दिल्ली, भगवान झा। जली हुई झुग्गी को निहाड़ते मनोरमा की डबडबाई आंखों का सामना आज कमला नेहरू कैंप का कोई भी शख्स नहीं कर पा रहा था। चारों तरफ खामोशी के बीच आंखों से बेबसी साफ झलक रही थी। जली दुकान में राखों के ढेर के बीच उनका लाडला राजेश ऐसी हालत में पड़ा था जहां से उसके जिंदा होने की कोई गुंजाइश नहीं बची थी। यहां तक की पहचान होने में भी दिक्कत हो रही थी। मनाेरमा दिनभर यही कहती रही कि आज मैं अपने जिगर के टुकड़े को बचा नहीं सकी।

इतना कहने के बाद गुस्से से उसका चेहरा लाल हो जाता और कहती, दुकान का मालिक टोनी बृहस्पतिवार रात नौ बजे धमकी देकर गया था कि आज झुग्गी रहे या न रहे, लेकिन तुम लोग नहीं रहोगी। यह आग टोनी ने ही लगाई है। जब इसका कारण पूछा गया तो उसने कहा कि दुकान पर शराब पीने के लिए लोग आते थे और वह उसका विरोध करती थी। इस कारण वह खफा रहता था।

 

मनोरमा ने बताया कि रात दस बजे आग लगी। धीरे-धीरे आग दुकान की छत तक पहुंचने लगी। चारो तरफ धुंआ ही धुंआ भरा हुआ था। जिस सीढ़ी से नीचे उतरते वह भी आग की चपेट में थी। किसी तरह एक दीवार को तोड़कर लोगों को बाहर निकाला जाने लगा। जिंदा बचने की आस बढ़ी और मैंने अपने दो वर्षीये बेटे को सीने से चिपकाया और आठ वर्षीय बेटे राजेश का हाथ पकड़कर नीचे कूदना चाहा, लेकिन धुआं इतना भर गया कि आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

इस बीच राजेश का हाथ छूट गया। धुुए के चलते कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा था। कुछ पल मैंने राजेश को ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिला। बिना समय गंवाए मैं अपने दो वर्षीय बेटे के साथ किसी तरह नीचे उतर आई। सोचा पहले इस बच्चे को नीचे सुरक्षित रख दूं, बाद में राजेश को ले आउंगी, लेकिन तबतक आग ने विकराल रूप ले लिया और छत भरभराकर गिर गई, जिसमें राजेश आग की चपेट में आ गया और हमसे सदा-सदा के लिए बिछड़ गया। मनोरमा ने बताया कि किसी तरह मेहनत मजदूरी कर हम अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं। मेरा बेटा राजेश तीसरी कक्षा में पढ़ता था। उसके लिए कई सपने संजोए थे, लेकिन इस घटना ने जो आघात दिया है उससे हम जीवन भर नहीं उबर सकते हैं। आग में सबकुछ जलकर राख हो गया। बेटे राजेश की एक तस्वीर भी नहीं बच सकी। 

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Edited By: Prateek Kumar