नई दिल्ली [संजय कृष्ण]। महात्मा गांधी के ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के उद्घोष का प्रभाव छोटानागपुर और संताल परगना में भी दिखा। रांची, पलामू, हजारीबाग, कोडरमा ऐसे क्षेत्र थे, जो सर्वाधिक प्रभावित हुए थे। हजारीबाग में सेंट्रल जेल होने की वजह से बहुत से क्रांतिकारी यहां कैद किए जाते थे। इसका भी यहां प्रभाव पड़ा और क्रांतिकारियों के यहां आने-जाने से भी स्वाधीनता समर का एक वातावरण तैयार हुआ। हालांकि अंग्रेजों के आगमन के साथ ही हजारीबाग सुलगने लगा था। कभी आंच धीमी होती तो कभी तेज। बलिदान की इस आंच में नाम चमका बाबू रामनारायण सिंह का।

वकालत छोड़ कूद पड़े आंदोलन में

बाबू रामनारायण सिंह का जन्म कांग्रेस की स्थापना से नौ दिन पहले यानी 19 दिसंबर, 1885 में वर्तमान चतरा जिले के हंटरगंज प्रखंड के दंतार गांव में हुआ था। बचपन से ही पढ़ाई में रुचि के कारण पिता भोली सिंह ने गांव की प्रारंभिक शिक्षा के उपरांत हजारीबाग के मिडिल वर्नाक्यूलर स्कूल में उनका दाखिला करवा दिया। स्कूली शिक्षा के उपरांत रामनारायण सिंह ने कलकत्ता में कानून की डिग्री ली। इसके बाद दो साल तक सरकारी नौकरी की। हालांकि यहां मन नहीं लगा तो फिर से 1916 में पटना ला कालेज में कानून का अध्ययन आरंभ किया और 1920 में पटना में वकालत शुरू की। इसके बाद वहां से वह चतरा आ गए और सब डिविजन में वकालत करने लगे।

गांधी के साथ देश सेवा में जुटे

इसी बीच महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया तो रामनारायण सिंह वकालत छोड़कर देशसेवा में जुट गए। हजारीबाग में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का श्रीगणेश 11 अगस्त से हुआ। सरस्वती देवी ने एक जुलूस संगठित किया, जिसका उद्देश्य नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना था। बाबू रामनारायण सिंह ने भी इसमें हिस्सा लिया। वह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जमकर बोलते। इसकी खबर जब हजारीबाग के तत्कालीन कलेक्टर को मिली तो बाबू रामनारायण सिंह की गतिविधियों पर नजर रखी जाने लगी। उनका नाम तुरंत अंग्रेजों की हिट लिस्ट में दर्ज कर लिया गया। इस बात की सूचना जब उन्हेंं मिली तो वह मुस्कुराते हुए बोले, ‘अब मेरी बातों का असर अंग्रेजी हुकूमत पर होने लगा है। अब यह कारवां महात्मा गांधी के निर्देश से आगे बढ़ता ही चला जाएगा।’

चतरा में कांग्रेस का गठन

वर्तमान हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, गिरिडीह में ‘करो या मरो’ का नारा गूंजने लगा। आंदोलन को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए 1857 की क्रांति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले चतरा में कांग्रेस का गठन किया गया। तब बाबू रामनारायण सिंह ने अपने भाई सुकलाल सिंह को भी कांग्रेस पार्टी का सदस्य बनाया। देखते ही देखते चतरा व हजारीबाग में कांग्रेस एक बड़ा संगठन बन गया। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं की नजर में भी बाबू रामनारायण सिंह आ चुके थे और उन्हें डा. राजेंद्र प्रसाद, डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, के. बी. सहाय, बद्री सिंह जैसे राष्ट्रीय नेताओं का संग-साथ मिलने लगा था।

शुरू हुआ गिरफ्तारी का सिलसिला

आंदोलन का प्रचार-प्रसार करते हुए पहली बार 1921 में बाबू रामनारायण सिंह गिरफ्तार हुए और जेल भेज दिए गए। इसके बाद तो उनके जेल आने-जाने का सिलसिला शुरू हो गया। 1921 से देश स्वतंत्र होने तक वह आठ बार जेल गए। 1934 में जब बिहार में भूकंप आया, तब कई कांग्रेसी नेताओं को स्वंयसेवा करने के लिए जेल से छोड़ा गया था, किंतु बाबू रामनारायण सिंह को तब भी जेल में ही बंद रखा गया। वह इससे तनिक भी विचलित नहीं हुए और जेल के अंदर स्वाधीनता सेनानियों को गुप्त रूप से प्रशिक्षित करते रहे। वे जेल से ही गुप्त चिट्ठियों के माध्यम से बाहर हो रहे स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रहते। 1942 के आंदोलन में तो इन्हें नजरबंद कर दिया गया था। दो साल बाद 1944 में भागलपुर जेल से रिहा किया गया। स्वाधीनता आंदोलन के साथ वे समाज सेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। स्वाधीनता आंदोलन में उनकी सक्रियता को देखकर महात्मा गांधी उनसे बहुत प्रभावित थे। इसका जिक्र उन्होंने बाबू रामनारायण सिंह को लिखे पत्रों में किया है।

तमाम मुद्दों को दी आवाज

देश स्वतंत्र होने के बाद महात्मा गांधी की तरह बाबू रामनारायण सिंह भी कांग्रेस से अलग हो गए। वह मानते थे कि देश की स्वतंत्रता के बाद गांव से शहर की ओर विकास की रूपरेखा तय की जाए। इसके लिए 1952 में वे हजारीबाग लोकसभा का निर्दलीय चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। झारखंड को अलग प्रांत बनाने की मांग उन्होंने ही पहली बार लोकसभा में की थी। संसद बनने से पहले वे 1946 में संविधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। संविधान सभा में पंचायती राज की वकालत करने वाले प्रमुख सदस्यों में भी बाबू रामनारायण सिंह शामिल थे। उन्होंने यह भी राय दी थी कि देश में सरकार की ऐसी व्यवस्था हो जिसे विशेष सेवक मंडल कहा जाए तथा प्रधानमंत्री को प्रधान सेवक के नाम से जाना जाए।

जम्मू पर था ऐसा मत

सक्रिय राजनीति से अलग जम्मू कश्मीर के मसले पर उनका मत था कि ‘एक विधान, एक निशान’ वहां भी लागू हो। इसके लिए उन्होंने डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ कई मंचों को साझा भी किया था। बाद में वे सक्रिय राजनीति से पूरी तरह अलग हो गए और संपूर्ण देश की यात्रा की। इसके बाद उन्होंने ‘स्वराज लुट गया’ नामक पुस्तक भी लिखी। एक दुर्घटना में घायल होने के बाद 24 जून, 1964 में चतरा के सदर अस्पताल में बाबू रामनारायण सिंह का निधन हो गया।

Edited By: Prateek Kumar