नई दिल्ली [मनीषा गर्ग]। मैं अपने माता-पिता का अकेला सहारा हूं। जब मुझे पता चला कि मैं कोरोना पॉजीटिव हो गया हूं तो उस समय मुझे मां की सबसे अधिक चिंता हुई, क्योंकि कल को यदि मुझे कुछ हो गया तो वह खुद को कैसे संभालेगी। मैंने पिताजी को फोन किया और उन्हें समझाया। वो रोने लगे, लेकिन मैंने उन्हें हिम्मत रखने को कहा। पश्चिमी जिले में कोरोना को मात देकर सुरक्षित घर लौटे शुभम डबास बताते हैं कि मुझे यकीन था मैं ठीक हो जाऊंगा, क्योंकि हमारी सकारात्मक सोच हमारे लड़ने की ताकत को कई गुना कर देती है।

महाराजा अग्रसेन अस्पताल में बतौर नर्सिंग स्टाफ कार्यरत सुभाष नगर निवासी शुभम डबास ने बताया कि दस मार्च को किडनी का एक मरीज उनके अस्पताल में आया था। 30 मार्च को मरीज के तीमारदार उन्हें गंगाराम अस्पताल में ले गए थे, जहां कोरोना की जांच में रिपार्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद मरीज के संपर्क में आए सात कर्मचारियों को अस्पताल में आइसोलेट कर दिया गया। घर पर मैंने मां को जैसे-तैसे समझाया और घर से आ गया।

रिपोर्ट आते ही उड़ गए थे होश

अस्पताल में तीन अप्रैल को हम सातों का सैंपल एकत्रित किया गया और अगले ही दिन चार लोगों की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। रिपोर्ट आने के बाद एक पल के लिए होश उड़ गए और मेरे सभी साथी कर्मचारी रोने लगे। उस समय सभी को हिम्मत बंधाते हुए मैंने सभी को कहा कि किसी को कुछ नहीं होगा। अस्पताल से सूचना मिली कि आधे घंटे में एंबुलेंस आने वाली है। मैंने तुरंत अपने बैंक अकाउंट के सारे रुपये पापा के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए, ताकि कल को यदि मुझे कुछ हो गया तो माता-पिता को रुपयों की कमी न हो।

वीडियो कॉल से की मां से बातें 

इसके बाद मैंने मां को वीडियो कॉल किया और उनसे खूब बात की। उन्हें कहा कि मेरे सारे कपड़ों को एक बार दोबारा धो देना। आरएमएल अस्पताल में ले जाकर हमे भर्ती किया गया और वहां एक बार फिर हमारे सैंपल लिए गए। अस्पताल में फोन पर परिजनों व दोस्तों के सवालों के जवाब देते-देते पूरा दिन कब बीत जाता था, पता ही नहीं चलता था। सुकून की बात यह है कि तीन दिन के बाद मेरी जांच हुई और इस बार रिपोर्ट नेगेटिव आई और मुझे डिस्चार्ज कर दिया गया। एहतियात के तौर पर मैं अभी भी घर में 14 दिनों के लिए क्वारंटाइन हूं।

अस्पताल के अपने अनुभव को साझा करते हुए शुभम बताते हैं कि उनके आसपास इतने सारे संक्रमित मरीज थे और सभी के मन में डर था कि अगले ही पल क्या होगा। इस माहौल में खुद को सकारात्मक रखना और दूसरों के बीच भी सकारात्मक बात को फैलाने की पूरी कोशिश रहती थी। इसके अलावा मां विडियो कॉल करती थी तो उन्हें यह दर्शाने की कोशिश रहती थी कि मैं अभी भी महाराजा अग्रसेन अस्पताल में ही आइसोलेट हूं। इस दौरान अपनी भावनाओं को मां से छुपाना बहुत चुनौतीपूर्ण था।

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