नई दिल्ली, एएनआइ। सोशल मीडिया अकाउंट को आधार से जोड़ने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। बुधवार को दायर PIL में याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से केंद्र सरकार को दिशा-निर्देश देने की मांग की है। 

कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि सोशल मीडिया के जरिए अफवाह फैलने से रोकने के लिए इसे आधार कार्ड, पैन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र में से किसी एक को लिंक किया जाए। ताकि अफवाहों पर लगाम लगाया जा सके। जिनके पास आधार कार्ड और पैन कार्ड नहीं है उनको किसी एक अन्य पहचान प्रमाण से सोशल मीडिया को लिंक करने दिया जाए।

याचिकाकर्ता के अनुसार, फेक न्यूज, पेड न्यूज और सोशल मीडिया पर फर्जी अकाउंट बनाने वालों पर नजर रखने के लिए किसी एक पहचान पत्र से लिंक किया जाना जरूरी है।  हाई कोर्ट से याचिकाकर्ता ने अपील की है कि सोशल मीडिया को आधार से लिंक करने के लिए केंद्र को उचित कदम उठाने का निर्देश दिया जाए। 

सोशल मीडिया को आधार से जोड़ने के सभी मामले सुनेगा सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया को आधार से लिंक करने संबंधी विभिन्न हाई कोर्टो में चल रहे सभी मामलों को अपने यहां ट्रांसफर कर लिया है। शीर्ष अदालत इस बात पर विचार करेगी कि क्या सरकार फेसबुक और वाट्सएप जैसी इंटरमीडियरीज को नागरिकों के सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी देने के लिए मजबूर कर सकती है।

शीर्ष अदालत ने केंद्र से सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए नियमों की अधिसूचना जारी करने संबंधी अपनी रिपोर्ट जनवरी में दाखिल करने को कहा है। इनमें संदेशों को पढ़े जाने की जिम्मेदारी इंटरमीडियरीज पर डालने संबंधी नियम भी शामिल किए जाने हैं।

देश के कई हाई कोर्ट में दाखिल है याचिका

सोशल मीडिया अकाउंट्स को आधार से जोड़ने और संदेशों के स्नोत का पता लगाने संबंधी कई मामले देशभर में विभिन्न हाई कोर्टो में लंबित हैं। जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने फेसबुक की याचिका स्वीकार करते हुए रजिस्ट्री को आदेश दिया कि वह सभी मामलों को प्रधान न्यायाधीश के समक्ष पेश करे, ताकि उन्हें जनवरी, 2020 के अंतिम सप्ताह में उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जा सके।

सोशल मीडिया कंपनियों का तर्क

  • फेक न्यूज, हेट स्पीच और सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने वाले संदेशों के स्नोत की जानकारी देना यूजर की निजता का उल्लंघन।
  • नियमों के तहत इंटरमीडियरीज डिक्रिप्शन उपलब्ध कराने के लिए बाध्य नहीं।
  • संदेशों को डिक्रिप्ट करने की तकनीक हमारे पास नहीं।

सरकार की दलील

  • नियमों का संशोधित मसौदा इलेक्ट्रॉनिक व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रलय के समक्ष, विचार-विमर्श की प्रक्रिया जारी।
  • 15 जनवरी 2020 तक तैयार हो जाएंगे नियम।
  • यह निजता में दखल का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला।
  • आतंकवादी निजता के अधिकार का दावा नहीं कर सकते।

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Posted By: Mangal Yadav

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