नई दिल्ली, अरुण श्रीवास्तव। उम्र 38 वर्ष। तीन बच्चों की मां। छह बार की विश्व चैंपियन। वर्तमान विश्व रैंकिंग तीन। 2012 के लंदन ओलिंपिक की कांस्य पदक विजेता। संभवत: आप समझ गए होंगे कि हम किसकी बात कर रहे हैं। जी हां, यह सब मणिपुर की महिला मुक्केबाज एमसी मेरी कोम के बारे में है। लेकिन खास बात यह है कि इतना कुछ हासिल कर लेने के बावजूद उनका सपना इस ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर अपना और अपने देश का नाम रौशन करने का है। यही कारण है कि इस उम्र में भी मुक्केबाजी के रिंग में उतरने के उनके जज्बे में जरा भी कमी नहीं आई है। उन्हें अपनी क्षमता और प्रदर्शन पर पूरा भरोसा है।

उधर, हरियाणा की 26 साल की महिला पहलवान विनेश फोगाट हैं, जो 2016 के रियो ओलिंपिक में घुटने की चोट के चलते पदक नहीं जीत सकी थीं। तब से उनके दिल में यह कसक बनी हुई है। यह उनके प्रदर्शन की जिद ही है कि चोट से ठीक होने के बाद हर प्रतियोगिता में प्रतिद्वंद्वी को धूल चटाते हुए आज उनकी विश्व रैंकिंग नंबर वन है। टोक्यो ओलिंपिक में गये भारतीय दल में ऐसे तमाम खिलाड़ी हैं, जिनमें अपने प्रदर्शन को लेकर भरपूर जिद और जुनून है। इनमें महिला निशानेबाज मनु भाकर (19 साल, विश्व रैंकिंग 2) व इलावेनिल वलारिवान (21 साल, विश्व रैंकिंग 1), पुरुष निशानेबाज दिव्यांश सिंह पंवार (18 साल, विश्व रैंकिंग 2) व अमित पंघाल (25 साल, विश्व रैंकिंग 1), पहलवान बजरंग पूनिया (27 साल, विश्व रैंकिंग 1) जैसे नाम प्रमुख हैं। कोरोना की वजह से ओलिंपिक में एक साल का विलंब होने के बावजूद इन खिलाड़ियों के हौसले में कोई कमी नहीं आई है, उलटे अपने प्रदर्शन को लेकर उनका निश्चय और दृढ़ हो गया है। जाहिर है जब वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेंगे, तो देश के लिए पदक जीतेंगे ही।

सपने हों व्यावहारिक

जीवन और करियर में आगे बढ़ने के लिए भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना जरूरी होता है। चाहे पढ़ाई हो या प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी या फिर नौकरी हासिल करने और उसमें तरक्की की बात ही क्यों न हो, यदि आप अपनी पसंद से जुड़े लक्ष्य को अच्छी तरह समझ कर उसे हासिल करने की दिशा में सही तरीके से कड़ी मेहनत करेंगे, तो कामयाबी भी मिलेगी और तरक्की भी। अक्सर युवा सपने तो बड़े देख लेते हैं, लेकिन उसके लिए जिस मेहनत की दरकार होती है, उसे अनदेखा कर देते हैं। प्रयासों में गंभीरता की कमी होने के कारण ही उन्हें कामयाबी से वंचित रह जाना पड़ता है। करियर को लेकर सपने देखने में कोई बुराई नहीं है, पर ऐसे सपनों को बुनने से पहले अपनी रुचि और सक्षमता को भी जरूर देख लें। यदि किसी दूसरे को देखकर, उससे प्रभावित होकर आपने भी कोई सपना देख लिया, तो जरूरी नहीं कि उसमें आपको कामयाबी मिल ही जाए। हो सकता है कि शुरुआत में आपको वह सपना प्रभावशाली लगा हो, लेकिन जब आप उसे हासिल करने की दिशा में प्रयास शुरू करते हैं तो कुछ दूर चलने के बाद मन का न होने के कारण उसके प्रति आप गंभीर नहीं रह पाते। इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि आप जो भी सपने देखें या लक्ष्य तय करें, वह आपकी पसंद का होना चाहिए। तभी आप उसमें जुनून की हद तक डूब सकेंगे और मंजिल हासिल कर सकेंगे।

प्रयासों में न हो कमी

एक बार किसी सपने को लक्ष्य बना लेने के बाद उसे पाने की दिशा में कदम बढ़ाना होता है। ये कदम कई चरणों में हो सकते हैं, क्योंकि कोई भी लक्ष्य झटके में या कम प्रयासों में हासिल करना लगभग असंभव होता है। इसके लिए धैर्यपूर्वक लगातार प्रयास करना होता है। आवश्यक संसाधन भी जुटाने पड़ सकते हैं। अच्छी तरह से सारी तैयारियां कर लेने के बाद जब आप मैदान में आत्मविश्वास और मनोबल के साथ उतरते हैं, तो जीत की संभावना अधिकतम होती है। हां, हो सकता है कि अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के बाद भी आपको कामयाबी से वंचित रह जाना पड़े। इससे हताश होने के बजाय आप यह देखें कि कहीं आपके प्रयास में कोई चूक तो नहीं हो गई। यह भी हो सकता है कि आपकी तुलना में दूसरे की तैयारी कहीं ज्यादा अच्छी रही हो, जिससे वह आपसे आगे निकलने में कामयाब हो गया। दोनों ही स्थितियों में आपको अपने प्रदर्शन और चूकों-गलतियों पर विचार करने के साथ दूसरे की सफलता में छिपे कारणों को भी तलाशने की जरूरत है। इसके बाद खुद को दुरुस्त करके अगर आप दोगुने उत्साह से फिर मैदान में उतरते हैं, तब आपका प्रदर्शन बेदाग और विजेता बनाने वाला हो सकता है।

समय रहते लें यू-टर्न

अगर आप किसी क्षेत्र में आगे बढ़ने और पहचान बनाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन कई प्रयासों के बाद भी आपको कामयाबी नहीं मिल पा रही है, तो ऐसी स्थिति में ठहरकर पुनर्विचार करने की जरूरत है। हो सकता है कि आपकी तुलना में दूसरे कहीं ज्यादा सक्षम हैं, जिसकी वजह से आप भरपूर प्रयास के बावजूद अपना स्थान नहीं बना पा रहे हैं। यह स्थिति पढ़ाई की स्ट्रीम को लेकर भी हो सकती है और किसी प्रतियोगिता परीक्षा के बारे में भी। अगर आपके साथ भी ऐसा होता है तो समय जाया करने और निराश-हताश होने के बजाय अपनी रुचि के किसी दूसरे क्षेत्र की तलाश करें और उसमें खुद को निखारने-संवारने का जतन करें। हो सकता है कि उसमें आपको अपेक्षित कामयाबी मिल जाए। यदि आपने अपने पहले वाले लक्ष्य को पाने के लिए साल-दर-साल लगा दिए और नतीजा शून्य ही रहता है, तो जीवन का यह कीमती समय यूं ही जाया हो जाएगा और आपको हासिल भी कुछ नहीं होगा। इससे बेहतर यही है कि यदि किसी प्रतियोगिता परीक्षा में दो-तीन साल पूरे दम-खम से प्रयास करने के बाद भी कामयाबी नहीं मिल पाती, तो दूसरे विकल्प को अपनाने में देर न करें।

परिणाम नहीं, कर्म पर करें फोकस

जो छात्र पूरे साल पढ़ाई करते हैं, परीक्षा आने पर उन्हें तनाव का कतई सामना नहीं करना पड़ता। उन्हें इस बात की चिंता नहीं होती कि प्रश्न कहां से पूछे जाएंगे। चूंकि उन्होंने समूचे पाठ्यक्रम की तैयारी की होती है, इसलिए वे सहज बने रहते हैं। अपने प्रदर्शन को लेकर उनमें भरपूर आत्मविश्वास होता है। प्रश्न चाहे जहां से पूछे जाएं, उन्हें परवाह नहीं होती। हालांकि ज्यादातर परीक्षार्थियों के साथ होता यह है कि परीक्षा आते ही उनके हाथ-पांव फूलने लगते हैं। इसका मतलब यही है कि उन्होंने पूरी तन्मयता, ईमानदारी और निरंतरता बनाए रखते हुए तैयारी नहीं की। आइएएस जैसी परीक्षाओं के साथ भी यही है। अधिकतर अभ्यर्थी आवेदन तो कर देते हैं, परीक्षा की चिंता भी हमेशा करते रहते हैं, लेकिन सही दिशा में तैयारी को लेकर कभी गंभीर नहीं हो पाते। परिणाम यह होता है कि साल-दर-साल परीक्षा देने के बाद भी उन्हें कामयाबी से वंचित रहना पड़ता है। कामयाबी और पहचान के लिए कर्म सबसे ज्यादा आवश्यक होता है।

Edited By: Shashank Pandey