नई दिल्ली [नेमिष हेंमत]। कंफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने बुधवार से बड़ी ई-कामर्स कंपनियों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया है। गफ्फार मार्केट में धरना-प्रदर्शन हुआ। इसमें शामिल व्यापारियों ने आरोप लगाया कि कुछ ई-कामर्स कंपनियाें के मनमाने कारोबार के चलते देश के खुदरा कारोबारियों को नुकसान पहुंच रहा है। स्मार्ट फोन, किराना और अन्य वस्तुओं की काफी दुकानें बंद हुई हैं।

देश में 500 जगहों पर हुआ प्रदर्शन

इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल ने किया। इसके बाद वह आगरा तक की विरोध यात्रा में भी शामिल हुए। उन्होंने दावा किया कि इस तरह का धरना-प्रदर्शन देश के 500 से अधिक स्थानों पर हुआ है। यह आंदोलन विदेशी ई-कामर्स कंपनियों द्वारा देश के कानूनों व नियमों का उल्लंघन कर व्यापार में मनमानी करने के खिलाफ है जो पूरे एक माह चलेगा। इस श्रृंखला में 23 सितंबर को राष्ट्रीय स्तर पर जिलाधिकारियों को प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा जाएगा।

अब भारत 1857 का भारत नहीं रहा

खंडेलवाल ने इन ई-कामर्स कंपनियों को चुनौती देते हुए कहा की वो अब 1857 का भारत न समझें और अपने आपको ईस्ट इंडिया कंपनी का दूसरा संस्करण बनाने का विचार त्याग दें। यह 2021 का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाला भारत है जिसमें देश के व्यापारी विदेशी कंपनियों को मुंह तोड़ जवाब देना जानते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ उद्योग संगठन और सरकारी तंत्र उनकी भाषा बोल रहे हैं। समय आने पर उनका पर्दाफाश होगा।

विदेशी कंपनियों को क्यों हो रही परेशानी

कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी सी भरतिया एवं खंडेलवाल ने कहा की सरकार यदि ई कामर्स व्यापार को पारदर्शी और व्यवस्थित करने के लिए नियम ला रही है तो विदेशी ई कामर्स कम्पनियों और उनके भोपुओं के पेट में दर्द क्यों हो रहा है ? प्रस्तावित नियमों के अंतर्गत प्रत्येक ई कामर्स कम्पनी के लिए आवश्यक पंजीकरण, सम्बंधित कम्पनियों द्वारा अपने मार्केट प्लेस पर सामान की बिक्री पर रोक तथा नोडल ऑफ़िसर अथवा शिकायत ऑफ़िसर का गठन क्या जायज़ नहीं है ?

नीति आयोग पर भी उठे सवाल

कौन नहीं जानता की ऐमज़ान अपनी सम्बंधित कम्पनी क्लाउडटेल जिसके मालिक व्यापार नारायण मूर्ति हैं, के ज़रिए अधिकांश माल की बिक्री करता है। यह भी समझ में नहीं आता की नीति आयोग क्यों अनीति का साथ दे रहा है ? आज भी जब विदेशी कम्पनियाँ देश के क़ानूनों का उल्लंघन कर रही है तब उनको कहने के बजाय नीति आयोग उपभोक्ता मंत्रालय के विवेक और अधिकार को चुनौती दे रहा है ?

Edited By: Prateek Kumar