नई दिल्ली [रितु राणा]। दिल्ली में बीते बचपन और युवावस्था के दिन आज भी जेहन में ताजा है। मुझे याद है तब हम कालकाजी में रहने आए थे। उस समय यहां नई कालोनियां बन ही रही थीं। आज यह भले ही दिल्ली के पाश इलाकों में से एक है, लेकिन उन दिनों यहां न तो पानी और न ही बिजली की कोई सुविधा थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अक्सर कालकाजी में निर्माण कार्य देखने आया करते थे।

इसी से जुड़ा एक किस्सा बताता हूं। मेरी बड़ी बहन स्नेह लता की उम्र उस समय करीब 18 वर्ष रही होगी। वह हम सब बच्चों के साथ मिलकर एक मानव श्रृंखला बनातीं और पंडित नेहरू की कार के आगे खड़ी हो जाती थीं। ऐसा वह इसलिए करती थीं ताकि वे वहां की परेशानियों से नेहरूजी को अवगत करा सकें। जैसे ही जवाहर लाल नेहरू आते सब लोग एक एक कर अपनी परेशानियां उन्हें बताने लगते। कोई अपने हाथ दिखाता कि कुएं से पानी खींच-खींचकर कितना बुरा हाल हो गया है तो कोई बिजली न होने के कारण अंधेरे से होने वाली परेशानियों का हवाला देता।

धीरे धीरे वहां विकास की गति तेज होने लगी और कालकाजी का नाम दिल्ली की पाश कालोनियों में दर्ज हो गया। फिर 1980 में हम विकासपुरी आ गए। वहां चारों ओर हरियाली थी। इसे पार्को की कालोनी कहा जाता है।

प्रकृति से था गहरा रिश्ता

स्कूल जाते समय अक्सर आसमान में साइबेरियन पक्षी उड़ते दिख जाते थे। वी आकार में उन पक्षियों को उड़ते देख हम वहीं रुक जाते और जब तक आंखों से ओझल न हो जाएं देखते रहते। उस समय अलग अलग तरह के पक्षी, कीट-पतंग खूब देखने को मिलते थे। लाल बीर बहूटी जिसको हम रेशम का कीड़ा समझते थे, उसे बच्चे बहुत प्यार से इकट्ठा करते थे। एक डबल डेकर नाम का कीड़ा भी होता था। उन दिनों ऐसा लगता था मानों दिल्ली और प्रकृति का गहरा रिश्ता हो। पेड़, पौधों, पक्षियों और कीट पतंगों से भरी नजर आती थी तब की दिल्ली।

नई दिल्ली मालचा गांव पर बनी है। मैं अक्सर पत्नी के साथ मालचा गांव के एक प्रसिद्ध रेस्त्रं ‘लजीज अफेयर’ पर जाता था। उसी के पास एक बड़ा सा बरगद का पेड़ था, वहां जाकर मन को बड़ा सुकून मिलता था। आज भी वह पेड़ वहां है।

परिचय

नवीन खन्ना का जन्म 1945 में पंजाब के फिरोजपुर में हुआ। बंटवारे के बाद वर्ष 1950 में वे परिवार के साथ दिल्ली आ गए। दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कालेज से स्नातक और एमए की पढ़ाई की। दिल्ली राज्य औद्योगिक विकास निगम में वरिष्ठ इंजीनियर व प्रथम श्रेणी खान प्रबंधक पद पर रहे। 2004 में सेवानिवृत हुए। फिर डीयू के नेताजी सुभाष प्रोद्यौगिक संस्थान में तीन वर्ष तक उप कुलपति का पदभार भी संभाला।

देवली की पहाड़ी पर ढूंढा महाभारत कालीन का शिलालेख

जब ग्रेटर कैलाश बन रहा था तब अखबारों में एक खबर छपी कि ईस्ट आफ कैलाश में सम्राट अशोक के समय के शिलालेख मिले हैं। उस खबर को पढ़ने के बाद पुरातत्व में मेरी रुचि बढ़ गई। आठ के दशक में मैंने देवली की पहाड़ी जिसे अब खानपुर देवली कहते हैं, वहां पर महाभारत कालीन शिलालेख ढूंढे जो चर्चा का विषय बना।

इसके बाद दिल्ली व उसके आसपास के इलाकों में खोज की। उसी दौरान वसंत कुंज में सम्मुख सुल्तान गौरी (नसरुद्दीन मुहम्मद) के मकबरे का लघु लेख मिला, जो संवत 1418 की किसी घटना की ओर संकेत करता है। मैदानगढ़ी में एक मंदिर में लघु लेख मिला, जो सुवपति नाल्हा के विषय में है।

Edited By: Mangal Yadav