नई दिल्ली [अरविंद कुमार द्विवेदी]। पर्यावरण के प्रति दिल्ली का प्रशासन व निगम कितना सजग व गंभीर है, इसकी बानगी शुक्रवार को दिख गई। एनजीटी के आदेश पर यमुना को प्रदूषण से बचाने के लिए बृहस्पतिवार को जिन कृत्रिम तालाबों में भगवान गणेश की प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया था, शुक्रवार को उन्हें रिज एरिया में खुले में डाल दिया गया।

मूर्तियों के अवशेष रिज एरिया में क्यों डाले जा रहे हैं, यह पूछने पर मौके पर मौजूद कर्मचारी ने कहा कि उन्हें कृत्रिम गड्ढों की सफाई करने की जिम्मेदारी तो दे दी गई है लेकिन यह नहीं बताया गया है कि आखिरकार मूर्तियों के अवशेष को कहां डाला जाए। इसलिए वह अपने हिसाब से इन मूर्तियों को फिलहाल इन गड्ढों से बाहर निकालकर खुले में रख रहे हैं। 

हैरत की बात तो यह है कि इन मूर्तियों को विसर्जन स्थल से भी करीब 100 मीटर नदी की ओर ले जाकर डाला जा रहा है। कर्मचारियों की इस लापरवाही से उस पूरी कवायद पर पानी फिर सकता है जिसके तहत इस बार यमुना के बजाय कृत्रिम गड्ढों में विसर्जन किया गया है।

हमारी जमीन पर नहीं डाल सकते अवशेष 
सिंचाई व बाढ़ नियंत्रण विभाग इस बारे में दिल्ली के सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग के एक एग्जिक्यूटिव इंजीनियर से बात की गई तो उन्होंने कहा कि विसर्जन के बाद मूर्तियों के अवशेष व पूजा सामग्री का सुरक्षित डिस्पोजल करना निगम का काम है। लेकिन वे हमारी जमीन पर इतनी बड़ी मात्रा में अवशेष जमा नहीं कर सकते। अवशेष नदी के किनारे लगे पेड़ों के पीछे डाला जा रहा हालांकि  उन्होंने कहा कि यह भी हो सकता है कि निगम वाले पहले अवशेषों को एक जगह एकत्र कर रहे हों और बाद में उसे ट्रकों से कहीं और ले जाया जाए।

पेड़ों की आड़ में डाल रहे अवशेष
मूर्तियों के अवशेष के ढेर लोगों को दिखाई न पड़ें, इसलिए गड्ढों से निकालकर अवशेष नदी के किनारे लगे पेड़ों के पीछे डाला जा रहा है। जबकि यह जगह नदी के और ज्यादा करीब है। जरा सी बारिश होने पर ये अवशेष बहकर फिर से नदी में चले जाएंगे। इससे उस पूरी कवायद का कोई लाभ नहीं रह जाएगा जिसके लिए नदी की बजाय कृत्रिम गड्ढों में मूर्ति विसर्जन किया गया है। इस बारे में निगम का पक्ष जानने के लिए एसडीएमसी सूचना एवं जनसंपर्क निदेशक को कॉल किया गया लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की।

इस तरह नुकसानदायक है अवशेष प्रतिमाएं
प्लास्टर ऑफ पेरिस, प्लास्टिक, सीमेंट, सिंथेटिक रंग, थर्मोकोल, लोहे की छड़, घास-फूस, पुआल, क्ले आदि से बनती हैं। इन्हें ऑयल पेंटों से रंगा जाता है। इनमें घातक रसायन मिले होते हैं। विसर्जन के बाद बायोडिग्रेडेबल सामग्री नष्ट हो जाती है लेकिन प्लास्टर ऑफ पेरिस और पेंट के घातक रसायन पानी में मिल जाते हैं। इससे पानी जहरीला हो जाता है। उसका असर जलीय वनस्पतियों, जीव-जंतुओं और इंसानों पर पड़ता है।

आयल पेंट में मौजूद भारी धातुएं जैसे तांबा, जस्ता, क्रोमियम, कैडमियम, सीसा, लोहा, आर्सेनिक और पारा जल स्रोतों के पानी में मिल जाते हैं। धातुएं नष्ट नहीं होती हैँ इसलिए वे धीरे-धीरे भोजन ऋंखला का हिस्सा बनकर इंसान के शरीर में भी पहुंचती हैं और कई बीमारियों का कारण बनती हैं। वहीं, पेड़ के  किनारे रखे जाने पर मूर्ति अवशेष से निकलने वाले रसायन पेड़ की जड़ों में जाकर उसे सुखा भी सकते हैं।

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Posted By: Mangal Yadav

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