नई दिल्ली, जेएनएन। केंद्र सरकार द्वारा लोकसभा में तत्काल तीन तलाक विधेयक पेश करते ही मुस्लिम समाज में भी इस कुरीति पर प्रतिबंध लगाने की मांग तेज हो गई है। हालांकि, कुछ इसे मोदी सरकार का राजनीतिक हथियार के तौर पर मान रहे हैं। पुरानी दिल्ली की सामाजिक कार्यकर्ता सादिया सईद ने कहा कि वह तत्काल तीन तलाक का समर्थन नहीं करती है, क्योंकि यह इस्लाम के खिलाफ है। इस्लाम में औरतों को काफी ऊंचा दर्जा दिया गया है। पर इसका भय दिखाकर शादी के बाद से ही औरतों को दबाकर रखने का प्रयास होता है।

तलाक के लिए इस्लाम में व्यवस्थित प्रावधान है, जिसमें एक समयावधि में आपसी रजामंदी से तलाक लिया जा सकता है। तत्काल तीन तलाक पर प्रतिबंध लगना चाहिए। वहीं, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच दिल्ली के अध्यक्ष मो. साबरीन ने कहा कि तत्काल तीन तलाक को लेकर मुस्लिम समाज में मतभेद है। देवबंदी कहते हैं कि तत्काल तीन तलाक जायज है। जबकि शिया इसको गैर इस्लामिक मानते हैं।

यह हालत तब है जब 27 मुस्लिम मुल्कों में तत्काल तीन तलाक प्रतिबंधित है। यह इस्लाम सम्मत भी नहीं है। अगर यह विवाद मुस्लिम समाज के लोग मिल बैठकर सुलझा लिए होते तो सुप्रीम कोर्ट और सरकार को इसमें हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसे में सरकार के इस प्रयास की सराहना की जानी चाहिए।

पीड़ित महिलाओं के भरण-पोषण का विधेयक में कोई जिक्र नहीं
कासमी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मुफ्ती एजाज अरशद कासमी ने कहा कि वह इसके हक में नहीं हैं। वैसे भी तत्काल तीन तलाक के मामले काफी कम हैं, लेकिन सरकार की मंशा पर शक है। सरकार इस मुद्दे को लेकर यह दिखाने की कोशिश में है कि इस धर्म में महिलाओं पर अत्याचार अधिक है। उन्होंने कहा कि मौजूदा विधेयक पर आपत्ति इसलिए भी है कि इसमें पीड़ित महिलाओं के देखभाल और बच्चों के भरण-पोषण के मामले को लेकर कोई जिक्र नहीं है।

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