नई दिल्ली[संजीव गुप्ता]। प्रसिद्ध लेखिका और गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा का कहना है कि साहित्य सृजन में सामाजिक सरोकार, माटी की गंध और लोक संस्कृति का पुट अवश्य होना चाहिए। ऐसा ही साहित्य सालों साल पढ़ा जाता है और एक लेखक की पहचान बनाता है। साहित्य सृजन कभी भी एसी कमरे में बैठकर नहीं होता। वह विश्व पुस्तक मेले में शुक्रवार को जागरण से बातचीत कर रही थीं। उन्होंने कहा, आज का साहित्य फटाफट साहित्य नजर आता है।

सोशल मीडिया से जुड़ा साहित्‍य खूब बिक रहा 
सोशल मीडिया से जुड़ा साहित्य भी बाजार में खूब बिक रहा है। उन्होंने कहा, 1979 में मेरी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई। आज भी नई पुस्तक लिखने से पहले मस्तिष्क शून्य हो जाता है। शून्य से ही कुछ नया और अर्थवान निकलता है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि, साहित्य हर दौर में पढ़ा जाता रहा है, आज भी पढ़ा जा रहा है। अंतर केवल स्तर में आया है।

अच्छा साहित्य हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है
अच्छा साहित्य हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। दादी-नानी की कहानियां भी हमें संस्कार देती रही हैं। अच्छा साहित्य समाज को एक दिशा देता है। समाज में संस्कार और नैतिक मूल्य भी प्रचारित करता है। वह बोली, मैं कुंभ मेले में जाना छोड़ सकती हूं, लेकिन पुस्तक मेला आना नहीं छोड़ सकती। यह मेले लेखकों और पाठकों को प्रोत्साहित करने का एक माध्यम हैं।

नई पीढ़ी फिर किताबों की ओर लौट रही
मुझे यहां आकर और पुस्तक प्रेमियों की भीड़ देखकर हमेशा अच्छा लगता है। उन्होंने कहा कि आज नई पीढ़ी भले मोबाइल, लैपटॉप और टेबलेट में व्यस्त नजर आती हो, लेकिन समय फिर बदलेगा। उन्हें पढ़ने की ओर मुखातिब होना ही पड़ेगा।

लंबे समय तक की हैं नौकरी
एक और सवाल के जवाब में वह बोली, लंबे समय तक दिल्ली में रही, यहां नौकरी भी की, इसलिए आज गोवा में रहने के बावजूद दिल्ली को मिस करती हूं। यहां से जुड़ी यादें हमेशा यहां लौटने को प्रेरित करती हैं। दिल्ली की बात ही निराली है।