गुरुग्राम [प्रियंका दुबे मेहता]। लगातार चल रही आनलाइन कक्षाओं के दौर में स्कूल और अभिवावकों के मध्य आती दरार के बीच एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है होम स्कूलिंग का। खासतौर पर वे बच्चे जो प्रारंभिक कक्षाओं में पढ़ रहे हैं। उन्हें स्कूल भेजने में अभिभावक परहेज कर रहे हैं और उन्हें एक बात समझ में आ गई है कि अभी न तो स्कूल भेजना सुरक्षित है और न ही आनलाइन कक्षाओं का खास फायदा हो रहा है। ऐसे में अभिभावकों ने बीच का रास्ता निकालते हुए होम स्कूलिंग का विकल्प निकाला है। इतना ही नहीं, कमजोर तबके के बच्चों को आनलाइन मंच मुहैया करवाकर भी कुछ महिलाएं नियमित काम से जुड़ रही हैं और अपने शौक को जी रही हैं।

बदलाव की इस बयार में उन महिलाओं का संसार संवर रहा है जो किसी कारण नौकरी छोडऩे को मजबूर हो गई थीं या फिर योग्य होने के बावजूद दायित्वों के निर्वाह के लिए अपने को घर-परिवार की धुरी पर घुमा रही थीं।

संभावनाओं की स्कूलिंग

संध्या पासवान ने जब देखा कि दो साल से उनका बड़ा बेटा आनलाइन पढ़ाई की तकनीकी और शैक्षणिक उलझनों में उलझा हुआ है तो उन्होंने छोटे बच्चे को स्कूल से निकलवा लिया। अब स्कूल नहीं तो और क्या? इस पर उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाली रीना मेहरा से बात की और अपने बच्चे को रीना के पास पढ़ने और कलात्मक गतिविधियां सीखने के लिए भेजने लगीं। धीरे-धीरे रीना के पास इस तरह के बच्चों की संख्या बढऩे लगी। उन्होंने बच्चों की कक्षाएं लेनी शुरू कीं और इन बच्चों को कलात्मक गतिविधियों के माध्यम से पढ़ाने लगीं।

रीना का कहना है कि मैैंने इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद आर्ट एंड क्राफ्ट का भी कोर्स किया था, लेकिन संयुक्त परिवार की जिम्मेदारियों में अपने शौक और करियर का मोह त्याग दिया था। कई बार उमंगों के पर लगाकर मन की चहारदीवारी को तोड़ उड़ान भरने की ख्वाहिश हुई, लेकिन हर बार दायित्वों की बेड़ियों ने मेरे परों को काट दिया। अब होम स्कूलिंग के चलन ने मौका दिया तो कम समय में ही मेरी सारी ख्वाहिशें पूरी हो रही हैैं। खास बात यह है कि इस काम में मुझे सफलता भी मिल रही है।

दोबारा शुरू किया करियर

अहमदाबाद निवासी दीप्ति भटनागर को 25 साल तक नर्सरी कक्षाओं में पढ़ाने के बाद कोरोना महामारी के दौरान नौकरी छोड़नी पड़ी। उनके कई पड़ोसियों ने उनसे कहा कि कोरोना संक्रमण के कारण वे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजना चाहते। ऐसे में आप (दीप्ति) उन्हें पढ़ा दें और उन्हें कुछ कलात्मक गतिविधियां भी सिखाएं। इस पर दीप्ति ने कहा कि वह ऐसे कक्षाएं नहीं लेतीं, लेकिन उनके पड़ोसियों ने उनसे काफी अनुनय-विनय कर कहा कि आप (दीप्ति) बस मेरे बच्चों की स्कूल की कमी को पूरा करवा दें तो अच्छा रहेगा। काफी सोचने के बाद दीप्ति को महसूस हुआ कि वह फिर से शुरुआत कर सकती हैं और बच्चों की कक्षाएं लेते हुए अपना घर भी संभाल सकती हैं।

दीप्ति को उम्मीद नहीं थी कि 25 साल की नौकरी के बाद अब उन्हें दोबारा इस तरह का मौका मिलेगा, लेकिन उन्होंने फिर से शुरुआत की तो अपने लिए स्वावलंबन के साथ-साथ अभिभावकों के लिए संतुष्टि और बच्चों के विकास के लिए जरिया तलाश लिया है। दीप्ति का कहना है कि इस नए काम को करने में बहुत आनंद आ रहा है। इसके साथ ही मुझे अपनी विशेषताओं का भी पता चल रहा है और स्वयं पर गर्व हो रहा है।

शौक से मजबूत कर रहीं नींव

गुरुग्राम निवासी रितिका कानव ने होम स्कूलिंग को लेकर एक बेहतरीन कांसेप्ट की शुरुआत की है। उन्होंने बच्चों को कंप्यूटर स्क्रीन और गैजेट्स से हटाकर ऐसी गतिविधियों से जोड़ने का काम शुरू किया है जिससे न केवल बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास हो रहा है, बल्कि उनका ध्यान स्मार्टफोन और कंप्यूटर से हटकर रचनात्मक कार्यों में लग रहा है। रितिका ने घर बसाने के बाद अपनी नौकरी छोड़ दी थी। कोरोनाकाल में वह देख रही थीं कि छोटे-छोटे बच्चे किस तरह से नई तकनीक के प्रति आकर्षित हो रहे हैैं।

महामारी के दौरान जब बच्चे घर पर ही थे तो उन्हें नई तकनीक से जुड़ने से रोका भी नहीं जा सकता था। बहुत विचार करने के बाद उन्होंने सोचा कि कुछ ऐसा किया जाना चाहिए जिससे बच्चों की रचनात्मकता खत्म न हो। इसके साथ ही बच्चों को शारीरिक और मानसिक रूप से सक्रिय रखा जा सके। फिर उन्होंने क्रैबो की शुरुआत की। क्रैबो असल में एक क्लास बाक्स है जिसमें कागज से लेकर रंग तक तमाम चीजें होती हैं। इन सभी चीजों को बच्चों के पास भेजा जाता है और कागजों के जरिए ही उनसे लिखित संवाद किया जाता है।

इसमें फोन या फिर लैपटाप, कंप्यूटर का किसी तरह से कोई जुड़ाव नहीं होता। बच्चे कागज पर लिखकर भेजे गए संदेशों का पालन करते हुए विभिन्न गतिविधियों में भाग लेते हैैं, कलात्मक चीजे बनाते हैं और अपनी सोच के जरिए नवाचार के लिए भी प्रेरित होते हैं। रितिका का कहना है कि जब बच्चे इन चीजों से जुड़कर माहौल से अलग हटकर कुछ करते और सीखते हैं तो उनके माता-पिता के साथ-साथ मुझे भी गर्व का अनुभव होता है कि मैैं वर्तमान चुनौतियों से विद्यार्थियों को उबार पा रही हूं। रितिका खुश हैं कि आखिर वह अपने कुछ करने के शौक को जी पा रही हैं और उनके इस शौक से भावी पीढ़ी की मजबूत और स्वस्थ नींव रखी जा रही है।

मिला मन को सुकून

मांटेसरी शिक्षण के लिए प्रशिक्षित दिल्ली निवासी राधा को छोटे बच्चों को पढ़ाने का बहुत शौक था। उन्होंने सोचा था कि वह बच्चों को पढ़ाएंगी, लेकिन उन्हें कई साल विदेश में रहना पड़ा तो नियमित तौर पर यहां नौकरी नहीं कर पाईं और उन्हें अपने शौक को पीछे छोडऩा पड़ा। लंबे समय के बाद वह हमारा गुरुकुल और पीपल ट्री संस्था के विद्या तरंग कार्यक्रम से जुड़ीं और उन्हें बच्चों को पढ़ाने का मौका मिला।

हालांकि वह भी इतना नियमित नहीं हो पाया। कोरोना महामारी के दौरान जब होम स्कूलिंग का ट्रेंड आया और उन्हें मौका मिला तो वह नियमित रूप से सामान्य और कमजोर तबके के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने लगीं साथ ही कहानियों के जरिए विद्यार्थियों की भाषा बेहतर करने और नैतिक मूल्यों के प्रसार के लिए काम करने लगीं। राधा को इस काम से इतनी खुशी मिल रही है कि वह अपने शौक के जरिए उस वर्ग में रोशनी का संचार कर पा रही हैं जिन्हें अपनी कक्षा व स्कूलों के नाम तक का पता नहीं होता। राधा का कहना है कि अब उन्हें लगने लगा है कि इस आपदा ने जो अवसर दिया है, उसमें वह अपने आप को अच्छी तरह साबित कर पा रही हैं।

Edited By: Mangal Yadav