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नई दिल्ली, (मनीषा गर्ग)। ऑपरेशन रक्षक के दौरान अनंतनाग में तैनात लांस नायक अरुण कुमार सिंह नेअदम्य साहस का परिचय दिया था। कारगिल युद्ध समाप्त होने के बाद वे अगस्त में 10 दिनों की छुट्टी पर घर आए थे। उस समय लांस नायक अरुण अपनी पत्नी को आश्वासन देकर गए थे कि वे नवंबर में दो महीने की छुट्टी पर घर आएंगे।

नवंबर में वे घर तो आए पर जिंदा नहीं। अपने पिता से प्रेरित होकर अब उनका बेटा नीतेश सिंह भी सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहता है। मूल रूप से बिहार के छपरा की रहने वाली नीलम सिंह बताती हैं कि 28 फरवरी 1994 को 17 साल की उम्र में अरुण कुमार सेना में भर्ती हुए थे। 81 फील्ड रेजीमेंट में तैनात थे।

1999 में तीन साल के लिए 36 आरआर यूनिट में अनंतनाग में तैनाती थी। यूनिट में तैनात सिपाही दुश्मनों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए गश्त पर जाते थे। 20 नवंबर को भी वे अपने साथियों के साथ फतेहपुर गांव में गश्त पर गए थे। दोपहर एक बजे जब वे गांव के पास पहुंचे तो विस्फोट (माइन ब्लास्ट) की चपेट में आ गए। वे बुरी तरह घायल हो गए। इसके बावजूद वे मैदान में डटे रहे। बाद में इलाज के लिए उन्हें सेना के बेस अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां 20 नवंबर 1999 को उन्होंने अस्पताल में दम तोड़ दिया।

नीलम बताती हैं कि अगस्त में जब अरुण घर आए थे, तब वे युद्ध का जिक्र करते थे। जब अरुण शहीद हो गए तो ये बात घर में मुझे किसी ने नहीं बताई। उस समय मैं छपरा में अपने मायके में थी। मेरे पिता मुझे ये कहकर दिल्ली लाए कि अरुण की दादी की तबियत काफी खराब है। जब मैं अपने ससुराल पहुंची तो घर के बाहर सेना की गाड़ी खड़ी थी। जैसे ही मैं अंदर गई तो मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। उस समय मेरा पांच माह का बेटा था। उनके शव को देखं उनके सभी सपने टूट गए। अधिकारियों ने जब उनकी बहादुरी के बारे में बताया तो मैंने काफी गौरवान्वित महसूस किया।

उनके खत व उनकी यादें आज भी मुझे हौसला देती हैं। हालांकि ऑपरेशन विजय में शहीद सैनिकों को जो गौरव मिला वह ऑपरेशन रक्षक में शहीद सैनानियों को कभी नहीं मिला। नीतेश बताते हैं कि उन्हें अपने पिता पर गर्व है। हालांकि उनकी याद उन्हें नहीं है। उनकी बहादुरी के किस्से सुन लगता है कि वे हमारे साथ हैं। मैं अब उनके नक्शे कदम पर चलकर देश के प्रति जिम्मेदारियों का निर्वाह करना चाहता हूं। 

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Posted By: Prateek Kumar

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