बाहरी दिल्ली [नवीन गौतम]। गांव के पनघट पर महिलाओं की वो हंसीठिठोली...माथे पर मटकी लिए टोले- मोहल्ले की बातें बतियातीं...छमछम करती उनकी पायलों की झनकार...अब न तो वह पनघट है और न ही हंसीठिठोली करती महिलाओं की वह टोली। विकास के होड़ में जोहड़, तालाब, कुएं और बावली जैसे पानी के प्राकृतिक स्त्रोत लगभग खत्म हो गए हैं। हालांकि तमाम सरकारी एजेंसियां ‘पानी की एक-एक बूंद कीमती है’ जैस स्लोगन वाले विज्ञापनों पर लाखों रुपये खर्च तो करती हैं, लेकिन वास्तवित धरातल पर इन प्राकृतिक जल स्नोतों को बचाने के गंभीर प्रयास नजर नहीं आ रहे हैं। यही वजह है कि दिल्ली में पानी की समस्या दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही है। यमुना की हालत गंदे नाले जैसी है। कुएं करीब-करीब खत्म ही हो चुके हैं और जोहड़ भी अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं। जो बचे हैं वह भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं।

गांवों में जोहड़ दिनचर्या के साथ-साथ संस्कृति का भी हिस्सा होते थे। गांव के सारे तीज-त्यौहार और मेले इन जोहड़ों के किनारे ही आयोजित किए जाते थे, लेकिन जोहड़ों के खत्म होने से अब उन तीज- त्यौहारों के चलन में भी कमी आ गई है। पहले पनघट पर गांव की महिलाएं समूह में लोकगीत गाती हुई पानी भरने जाती थीं, कुछ पल वहीं बैठ कर दुख-दर्द एक दूसरे से साझा किया करती थीं, लेकिन अब यह इतिहास के पन्नों तक सिमट गया है। अकेले बवाना गांव की ही बात करें तो यहां करीब बीस-पच्चीस साल पहले तक 8-10 जोहड़ और छोटे तालाब (जोहड़ी) हुआ करते थे। दुख की बात तो यह है कि आज उनमें से एक भी जोहड़ पूर्ण रूप से बचा हुआ नहीं है। गांव में 8 पन्ने (मोहल्ले) हैं। इनके अपने अलगअलग जोहड़ होते थे। गांव के लोग पशुओं को पानी पिलाने, नहलाने और कपड़े धोने के लिए यहीं आया करते थे। बेगवाण पन्ने में गांव का बड़ा जोहड़ जिसका नाम कान्हा फेरा था, लगभग 20 एकड़ में फैला हुआ था। इसके किनारे एक कुआं और शीतला माता का मंदिर भी था। जहां होली के बाद शीतला माता की पूजा के लिए तालाब से मिट्टी निकालकर मंदिर पर चढ़ाई जाती थी, इससे तालाब की गहराई भी बनी रहती थी।

मंदिर तो आज भी वहीं स्थित है लेकिन जोहड़ राजीव गांधी स्टेडियम की भेंट चढ़ गया है। गांव की उत्तरी दिशा में खटाकर, बलाल वाली, दोहली, छतरी वाला तथा पूर्वी दिशा में हिंदू वाला तथा बाजार वाला नाम से कई सारे जोहड़ होते थे। लेकिन आज ये सब अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं। बाजार वाले जोहड़ के कुछ हिस्से पर मौजाण पन्ने की चौपाल बना दी गई है। यही स्थिति करीब-करीब सभी गांवों में है।

जोहड़ों पर अवैध कब्जे

आज दिल्ली के लोग पानी की एक-एक बूंद को तरस रहे हैं। पानी के लिए सिर फुटव्वल तक की नौबत तक आ गई है और यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकारी एजेंसियों के नाक के नीचे जोहड़ों पर अवैध कब्जे होते रहे, लेकिन उसे रोकने की कोशिश तक नहीं की गई। जोहड़ों की सैकड़ों एकड़ जमीन पर भूमाफिया ने कब्जा कर अवैध कालोनियों का निर्माण कर उसे बेच दिया। एक समय अकेले दिल्ली के उत्तर-पश्चिम जिले में कुल 72 जोहड़ हुआ करते थे, लेकिन आज स्थित यह है कि इनमें से 15 का अस्तित्व पूरी तरह से समाप्त हो चुका है।

किराड़ी इलाके के चार जोहड़ों की करीब 50 बीघे जमीन पर अवैध कालोनियां, धार्मिक स्थल और चाहरदीवारी बना दिए गए हैं। इसी तरह बवाना, बाजितपुर ठाकरान, निजामपुर आदि गांवों के तालाबों की जमीन भी अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए। इन गांवों में तालाब की जमीन पर लोगों ने पक्के मकान और झुग्गी बना लिए हैं। हालांकि इन जोहड़ों में से कुछ की जमीन का इस्तेमाल विकास कार्यों के लिए किया गया है। जौंती, झीमपुर के जोहड़ पर प्राथमिक स्कूल, सलाहपुर में बीस कार्यक्रम के तहत भूमिहीनों को आवंटन व मुबारकपुर डबास में चौपाल आदि बनाए गए हैं। वहीं लाडपुर, सहीपुर, कंझावला, मंगोलपुर खुर्द, नेबसराय इलाके में स्थित तालाबों पर अतिक्रमण है।

पानी की तरह बहा पैसा नदी अब भी मैली

यमुना की सफाई के लिए पहली बार वर्ष 1993 में यमुना एक्शन प्लान लागू किया गया, जिसमें करीब 680 करोड़ रुपए खर्च हुए। हालांकि इनमें से ढाई सौ करोड़ रुपये सिर्फ 175 सार्वजनिक सुविधा परिसर बनाने के नाम पर खर्च किए गए। उसके बाद वर्ष 2004 में दूसरा प्लान बनाया गया, इसकी लागत करीब 624 करोड़ रुपये तय की गई। पिछली बार की तरह इसमें से भी सवा सौ सार्वजनिक सुविधा परिसर बनाने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। लेकिन, परिणाम कुछ खास नजर नहीं आए। दिल्ली जल बोर्ड ने 1998-99 में 285 करोड़ रुपये और उसके बाद 1999 से 2004 तक 439 करोड़ रुपये खर्च किए। दिल्ली राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (डीएसआईडीसी) ने 147 करोड़ रुपये अलग खर्च कर दिए। इन सारी योजनाओं में ज्यादातर राशि सार्वजनिक सुविधा परिसर बनाने और औद्योगिक क्षेत्रों में कॉमन ट्रीटमेंट प्लांट लगाने पर खर्च किए गए। मगर कैग की तल्ख टिप्पणी के बाद भी इन सरकारी एजेंसियों ने इतनी राशि खर्च कर बनाए गए इन परिसरों की तरफ ध्यान तक नहीं दिया।

कुएं तक सूख चुके हैं

वर्षों पहले बरसात के दिनों में तालाब पानी से लबालब भर जाते थे। इन तालाबों के भरे रहने से जमीन में पानी का स्तर 5-6 फीट की गहराई तक बना रहता था, लेकिन आज जोहड़ों के खत्म हो जाने से पानी का लेबल घटकर 50 से 60 फीट नीचे चला गया है। यही वजह है कि आज पनघट से लेकर कुएं तक सूख चुके हैं। पहले इन्ही कुओं से रहट द्वारा सिंचाई की जाती थी, लेकिन अब दिल्ली देहात के गांव के शायद ही किसी कुएं में पानी नजर आए। हालात ऐसे हो चुके हैं कि सिंचाई के साधारण ट्यूबवेल भी जल स्तर नीचे जाने की वजह से बेकार हो गए हैं। 

By Sanjay Pokhriyal