नई दिल्ली [विष्णु शर्मा]। अभिनेता मनोज कुमार। उम्र 83 वर्ष। भारत-पाकिस्तान के दो-दो शहरों से दिलचस्प तरीके से जुड़ी हैं। जिस जगह ओसामा मारा गया, उसी ऐबटाबाद में वो पैदा हुए, बंटवारे के वक्त खून की होली के बीच वो वारिस शाह के शहर जंडियाला शेरखान से दिल्ली आए, किंग्जवे कैंप की हडसन लेन के रिफ्यूजी कैंप में पनाह मिली। खास बात ये रही मोहब्बत और एक्टिंग दोनों ही दिल्ली में सिने घरों में परवान चढ़ीं।

दंगे के कारण नहीं मिला कुक्कू काे इलाज

जब रिफ्यूजी कैंप में आए, उससे पहले मनोज कुमार और उनकी एक छोटी बहन ललिता थीं। मां गर्भ से थीं, लड़का हुआ, नाम रखा कुक्कू, मां-बच्चा दोनों बीमार। दंगे अभी थमे नहीं थे, तीसहजारी हास्पिटल में जब दंगों का साइरन बजता था, सारे डाक्टर और नर्स अंडरग्राउंड हो जाते थे। एक दिन जब सारा स्टाफ साइरन सुनते ही बेसमेंट में छुप गया, कुक्कू की तबीयत खराब होने लगी, मां ने काफी आवाजें लगाईं, लेकिन कोई नहीं आया। दो महीने का कुक्कू नहीं रहा। जब मनोज को पता चला तो वो लाठी लेकर बेसमेंट में जा पहुंचे और क्या डाक्टर और क्या नर्सेज, सबको मारा। कुक्कू की अंतिम यात्रा यमुना में हुई। मनोज कुमार ने एक इंटरव्यू में बताया, 'जैसे जैसे वो नीचे जा रहा था, वैसे वैसे लगता था कि मैं डूब रहा हूं...फिर पिताजी ने सिर पर हाथ रखकर कसम खिलवाई कि जिंदगी भर दंगा, मारपीट नहीं करोगे।

संयुक्त परिवार में रहे मनोज कुमार

संयुक्त परिवार था। सो उसमें दादी, चाचा-चाची, मामू का परिवार सभी साथ रहते थे। चाची ने ही उनका नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी और घर का नाम घुलु रखा। युवा हरिकृष्ण ने 'शबनम' फिल्म में दिलीप कुमार का नाम मनोज कुमार देखा, तो तय कर लिया कि एक्टर बनूंगा तो यही नाम रखूंगा। हालांकि पूरी दिल्ली में हाकी प्लेयर के तौर पर उनका नाम था।

दिल्ली में ही मिली प्रेमिका

दिल्ली ने ही उनको प्रेमिका भी दी, शशि, जो सिरसा की थीं, उन दिनों पुरानी दिल्ली में रह रही थीं। वहीं स्नातक में मनोज एक दोस्त के घर पढ़ने जाते थे तो शशि को देखा। और उस तारीख को फिर कभी नहीं भूले। छह जून 1954 कई दिनों तक कोई बात नहीं हुई, लेकिन पसंद करने लगे थे। फिर दोस्तों ने दोनों को मिलाने के लिए आडियन सिनेमा में फिल्म देखी, 'उडऩखटोला' दोनों ही मूवीज के शौकीन निकले, दोस्ती हुई, पांच साल तक अफेयर चला, कई फिल्में साथ देखीं, शादी भी हुई। मनोज के घरवाले राजी थे, शशि के भाई और मां खिलाफ थे, शशि अपने टेरेस पर आ जाती थीं और मनोज गली से उनके दर्शन किया करते थे।

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फिल्मों का शौक और ब्रेक दिल्ली में ही

उनके मामू ने उन्हेंं पहली फिल्म दिखाई थी 'जुगनू', उसमें हीरो की मौत हो जाती है, दूसरी फिल्म दिखाई 'शहीद', दिलीप कुमार की उसमें भी मौत हो जाती है। वो परेशान हो गए, रात को मां से पूछा, आदमी कितनी बार मरता है, वो बोलीं -एक बार, मनोज ने पूछा -जो दो-तीन बार मरे, बोलीं वो फरिश्ता ही होगा, उन्होंने सोचा बड़े होकर फरिश्ता ही बनूंगा। यहीं से एक्टर बनने का सपना जगा। लगा कि एक्टर ही फरिश्ते होते हैं।

26 जनवरी को खुली किस्मत

मनोज कुमार की जिंदगी में 26 जनवरी किस्मत खोलने वाली तारीख थी, 1956 में इसी दिन दिल्ली के नोवल्टी सिनेमा में उनके कजिन डायरेक्टर लेखराज भाखरी की मूवी 'तांगेवाली' का प्रीमियर था, मनोज से बोले 'तुम तो हीरो लगते हो' उनका जवाब था,'तो बना दो'। नौ महीने बाद ही मनोज बंबई (अब मुंबई) में थे। नौ अक्टूबर 1956 को फ्रंटियर मेल से मुंबई निकले, स्टेशन पर उनके चाचा हरवंश, बहन ललिता के साथ शशि भी आई थीं। लेखराज ने फिल्म 'फैशन' में 19 साल के मनोज को एक 90 साल के बूढ़े का किरदार मिला था। फिर एक रोल मूवी 'सहारा' में भी दिया।

रिफ्यूजी कैंप के बाद बाद मनोज कुमार का परिवार ओल्ड राजेंद्र नगर में शिफ्ट हो गया था, लेकिन मनोज कुमार हर इंटरव्यू में केवल हडसन लेन के रिफ्यूजी कैंप की यादों की ही चर्चा करते रहे हैं। उनके पिता एचएल गोस्वामी एक व्यापारी थे, शायर भी, उनकी रचना 'सिमरन' पर महाराष्ट्र उर्दू अकेडमी का एक अवार्ड भी मिला था। उस रिफ्यूजी कैंप के वो प्रेसीडेंट थे। पूरे कैंप की परेशानियां दूर करने के लिए उन्होंने काफी मेहनत की थी।

हिंदू कालेज के नाटी स्टूडेंट ने जब मांगा गल्र्स हास्टल में रूम

मनोज दिल्ली के हिंदू कालेज में पढ़े थे। 2019 में हिंदू कालेज में दशकों बाद आए तो पूरे परिवार के साथ, बेटा, बहू और नाती को लेकर, लेकिन ह्वील चेयर पर, बोले- ऐसा लग रहा है, जैसे शादी के बाद कोई लड़की मायके वापस आई हो। उनको बताया गया कि हिंदू कालेज में एक गल्र्स हास्टल बन रहा है, तो कालेज का ये नाटी स्टार इस उम्र में भी शरारत करने से नहीं चूका, पूछा- मुझे उस हास्टल में एक कमरा मिलेगा क्या? उन दिनों वो भी थोड़ा राजनीति में सक्रिय हो गए थे, एक दिन हवालात की हवा भी खाई।

जब भगत सिंह की मां को उनके पिता लेकर आए दिल्ली

बचपन में गली के एक प्ले में उन्हेंं भगत सिंह का रोल मिला था, लेकिन सबके सामने स्टेज तक पर जाने में हिचक गए। दिल में ये बात बनी रही और तमाम पत्रिकाओं में भगत सिंह पर लिखे लेख इकट्ठे करते रहे। एक स्क्रिप्ट लिखकर दोस्त कश्यप को दिखाई और फिर एक मूवी बना डाली 'शहीद', जिसे तीन नेशनल अवार्ड मिले तो उनके पिता खुद भगत सिंह की मां विद्यावती को अवार्ड समारोह के लिए लेकर आए, ना केवल मनोज कुमार बल्कि इंदिरा गांधी ने भी उनके पैर छू लिए थे।

शास्त्री जी, इंदिरा, मोदी सभी मुरीद

बाद में उन्होंने संसद मार्ग पर हुई 1981 की किसान रैली के लिए एक डाक्यूमेंट्री भी बनाई, जिसमें इंदिरा, सोनिया और राजीव तीनों को दिखाया था, फिल्म्स डिवीजन आडीटोरियम में इंदिरा गांधी के लिए स्पेशल स्क्रीनिंग रखी। शास्त्रीजी तो उनके इतने मुरीद हो गए थे कि उनको अपने नारे 'जय जवान जय किसान' पर मूवी बनाने की सलाह दी थी, तो तब पर्दे पर आई थी 'उपकार'। पीएम मोदी के साथ अपनी 1984 की तस्वीर देखकर चौंक गए थे, वो भाजपा के गुजरात में चुनाव प्रचार की थी, मोदी ने उन्हेंं फिल्म म्यूजियम के उद्घाटन पर भी आमंत्रित किया और फिर 2015 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार भी उन्हेंं मिला। हालांकि दिल्ली के ही शाहरुख ने 'ओम शांति ओमÓ में उनका मजाक उड़ाया तो उन्हेंं अच्छा नहीं लगा, शाहरुख की माफी के बावजूद।

Edited By: Prateek Kumar