नई दिल्ली, जेएनएन। जामिया मिल्लिया इस्लामिया और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के शोधार्थियों के शोध के अनुसार पिछले वर्ष लाकडाउन के दौरान दिल्ली में यमुना में अधिकांश स्थानों पर प्रदूषण का स्तर कम हुआ है। इसके पीछे बड़ी वजह उस दौरान यमुना में जल की उपलब्धता व औद्योगिक इकाइयों का बंद होना है। यमुना को स्वच्छ बनाने के लिए लाकडाउन जैसी स्थिति की तो वकालत नहीं की जा सकती है, लेकिन गंभीर प्रयास से इसके गौरव को जरूरत लौटाया जा सकता है। इस दिशा में काम करने के दावे भी होते हैं। प्रत्येक चुनाव में यह बड़ा मुद्दा बनता है। सभी राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने पर यमुना को प्रदूषण से मुक्त करने का वादा करती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद इसे लेकर गंभीरता नहीं दिखाई जाती है। यही कारण है कि करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी कोई परिणाम हासिल नहीं हुआ है।

इस नदी में गंदा पानी गिरने से रोकने के लिए प्रस्तावित अधिकांश परियोजनाएं देरी से चल रही हैं। इसे लेकर पिछले दिनों केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र ¨सह ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखा था। यह सही है कि यमुना नदी का सिर्फ दो फीसद दायरा ही दिल्ली में आता है, लेकिन यह इसके 80 फीसद प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है। इस स्थिति को सुधारने की जरूरत है। इसके लिए केंद्र सरकार ने नामामि गंगे परियोजना के तहत इसकी सफाई व गंदा पानी नदी में जाने से रोकने से संबंधित 13 परियोजनाओं के लिए दिल्ली सरकार को 2419 करोड़ रुपये की सहायता उपलब्ध कराई है। इससे रोजाना 1385 मीलियन लीटर सीवर के पानी को साफ कर यमुना में बहाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इस काम को जल्द पूरा किया जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह इस नदी के प्रवाह को दुरुस्त करने का काम करें। बहाव न होने की वजह से गंदगी नदी के तल पर जमी रहती है, जिससे वह प्रदूषित हो रही है। दिल्लीवासियों को भी अपना योगदान देना चाहिए। नदी में किसी भी प्रकार की गंदगी न जाए यह सुनिश्चित करना होगा।