नई दिल्ली [राकेश कुमार सिंह]। अरुणाचल प्रदेश-गोवा-मिजोरम और यूनियन टेरेटरी कैडर के 1979 बैच के देश के सबसे वरिष्ठ आइपीएस आलोक वर्मा को बृहस्पतिवार को सीबीआइ निदेशक पद से हटाने के बाद बृहस्पतिवार को दिल्ली पुलिस मुख्यालय में इसकी खूब चर्चा रही।

दिल्ली पुलिस में तैनात उनके चहेते अफसरों में भय व्याप्त है तो वहीं अन्य कई अधिकारियों ने राहत की सांस भी ली है, क्योंकि दिल्ली पुलिस आयुक्त रहते भी आलोक कुमार वर्मा के रिश्ते अधीनस्थों से कभी मधुर नहीं रहे। आइपीएस अधिकारी इसके पीछे वर्मा के अडिय़ल स्वभाव को वजह मानते हैं। एक फरवरी 2017 को वर्मा ने सीबीआइ निदेशक की कमान संभाली थी।

बीते दिनों सीबीआइ निदेशक व विशेष निदेशक के बीच की लड़ाई खुलकर सामने आने से आइपीएस लॉबी के साथ यूटी कैडर भी हैरान है। अधिकारी मानते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम से यूटी कैडर पर दाग लगा है, क्योंकि अब तक यूटी कैडर में ऐसा कभी देखने को नहीं मिला था।

तिहाड़ जेल के रहे महानिदेशक

5 अगस्त 2014 से 26 फरवरी 2016 तक वर्मा तिहाड़ जेल के महानिदेशक रहे। 2015 में उनके कार्यकाल में चार माह के दौरान तिहाड़ जेल में 17 कैदियों की मौत हुई थी। देश की सबसे बड़ी व सुरक्षित मानी जाने वाली तिहाड़ जेल में कैदियों के बीच भी गैंगवार शुरू हो गई थी। यही नहीं, तिहाड़ में सुरंग बनाकर व दीवार तोड़कर दो खतरनाक कैदियों के भाग जाने की घटना भी पहली बार उनके कार्यकाल में हुई।

अधीनस्थों पर करते थे शक

तिहाड़ में हुई घटनाओं से दिल्ली पुलिस में खलबली मच गई थी। घटनाएं मीडिया की सुर्खियां बनीं तो आलोक वर्मा को शक हो गया कि दिल्ली पुलिस के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें बदनाम करने के लिए जेल ब्रेक की घटना लीक की थी ताकि वह दिल्ली पुलिस आयुक्त की दौड़ से बाहर हो जाएं।

प्रोबेशन पर दिल्ली पुलिस छोड़ गए दो अधिकारी

29 फरवरी 2016 को पुलिस आयुक्त का पदभार संभालने के कुछ घंटे में ही आलोक वर्मा ने अधीनस्थों को आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया था। कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों की मीटिंग बुलाई थी और चुनिंदा अधिकारियों को निशाने पर लिया था। बैठक में वर्मा के निशाने पर पूर्व पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी के करीबी वरिष्ठ विशेष आयुक्त धर्मेंद्र कुमार रहे थे।

बैठक में मोबाइल की घंटी बजने पर वर्मा ने धर्मेंद्र कुमार को अन्य अधिकारियों के सामने बुरी तरह डांट दिया था। उनके निशाने पर दिल्ली पुलिस के सुपर कॉप तत्कालीन विशेष आयुक्त दीपक मिश्रा भी आए थे। दोनों में भी अनबन खुलकर सामने आ गई थी। हालात इतने बिगड़ गए थे कि दीपक मिश्रा व धर्मेंद्र कुमार ने प्रोबेशन पर दिल्ली पुलिस छोडऩा ही उचित समझा। अंतत: दीपक मिश्रा सीआरपीएफ और धर्मेंद्र कुमार सीआइएसएफ में चले गए थे।

वरिष्ठ आइपीएस के अनुसार, धर्मेंद्र कुमार व दीपक मिश्रा के पुलिस आयुक्त बनने की बारी आई तब वर्मा ने उनके खिलाफ गृह मंत्रालय व पीएमओ में काफी शिकायत की जिससे वे इससे वंचित रह गए। दोनों वरिष्ठ आइपीएस अफसरों का करियर तबाह करने में वर्मा की बहुत बड़ी भूमिका रही, जिसे आज तक आइपीएस लॉबी नहीं भूल पा रही है। हालांकि, अब दोनों सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

आलोक वर्मा ने दिल्ली पुलिस में वर्षों से प्रवक्ता रहे राजन भगत को हटाकर दिल्ली पुलिस के मीडिया सिस्टम को पूरी तरह बदल दिया था। दिल्ली पुलिस आयुक्त के तौर पर 11 महीने के कार्यकाल में वर्मा ने सालाना प्रेस वार्ता भी नहीं होने दी थी। राजन भगत को हटाकर उन्होंने तीन अधिकारियों को प्रवक्ता की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंप दी थी।

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Posted By: JP Yadav

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