नई दिल्ली (हंस राज)। प्रख्यात अभिनेता, रंगकर्मी, लेखक गिरीश कारनाड के निधन से साहित्य जगत के साथ रंगमंच की दुनिया में एक बड़े दिग्गज की कमी हमेशा खलेगी। दरअसल, नाटकाकर गिरीश ने अपना पहला नाटक ययाति 1961 में ल‍िखा था, लेकिन महज 26 साल की उम्र में साल 1964 में दूसरा नाटक "तुगलक" ल‍िखा तो वे रंगमंच की दुनिया में विशिष्ट हो गए, क्योंकि इस नाटक के बाद तुगलक का वह पहलू भी सामने आया, जिससे दुनिया अंजान थी। इस नाटक में मुहम्मद ब‍िन तुगलक के जीवन को बारीकी से बताया गया है। 

शीर्षस्थ रंगकर्मी गिरीश कारनाड
समकालीन भारतीय कला जगत में चित्रपट कथा लेखक और फिल्म निर्देशक के साथ ही शीर्षस्थ रंगकर्मी के रूप में स्थापित कारनाड का जन्म 1938 में महाराष्ट्र के माथेरान में एक चिकित्सक परिवार में हुआ था। उनका बचपन बहुत संघर्षपूर्ण था जहां उन्होंने अपनी मां को बच्चों के पालन-पोषण के लिए अनेक तकलीफें उठाते देखा था। वह बचपन से ही प्रतिभाशाली थे और अपने सभी भाई-बहनों के संरक्षक भी।

शेड्स स्कॉलरशिप

1958 में स्नातक उपाधि प्राप्त करने के दो साल बाद उन्हें शेड्स स्कॉलरशिप मिली और वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई के लिए गए। वहीं उन्होंने अपना पहला नाटक ययाति लिखा, जिसका मंचन इंग्लैंड में भी हुआ। बाद में वह लगातार नाट्य लेखन में सक्रिय रहे। चेन्नई में स्थापित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में प्रबंधक के रूप में काम करते हुए उन्होंने तुगलक, हयवदन, अंजुमालिगे, हूमा, हुंजा, नागमंडल, द फायर एंड द रेन नाटकों का लेखन किया। इन नाटकों से उनकी यात्रा का आकलन करें तो वह उत्तम से उत्कृष्ट होती चली गई। ये सभी कृतियां साहित्यिक मूल्यों से परिपूर्ण और रंगप्रयोगों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और प्रभावी मानी जाती हैं। कारनाड ने बादल सरकार, मोहन राकेश और विजय तेंदुलकर की सक्रियता के दौर में अपनी सृजनशीलता से समानांतर प्रतिष्ठा और सम्मान अर्जित किया।

पचास से ज्यादा फिल्मों का निर्माण

सिनेमा के क्षेत्र में उनके अवदान को तो नकारा जा ही नहीं सकता। अब तक पचास से ज्यादा फिल्मों का उन्होंने निर्माण किया, दस से अधिक वृत्तचित्र बनाए और लगभग इतने ही दूरदर्शन धारावाहिकों का निर्माण भी किया। उनकी सर्वाधिक चर्चित फिल्मों में काडु का नाम लिया जाता है। संस्कारा उनकी पहली फिल्म थी जिसमें पटकथा लेखन के साथ ही उन्होंने अभिनय भी किया था। वंश वृक्ष, निशांत, मंथन, भूमिका, कलयुग, गोधूलि, उंबरठा, सुबह, स्वामी, चेलुवी आदि उनकी अन्य चर्चित फिल्में थीं। शशि कपूर के आग्रह पर उन्होंने उत्सव फिल्म का निर्देशन भी किया था जो अपने समय की एक बड़ी प्रयोगधर्मी और क्लासिक फिल्म मानी जाती है।

होमीभाभा फेलोशिप

अकीरा कुरोसावा से प्रेरित उनकी एक अत्यंत महत्वपूर्ण फिल्म ओंडानेंडु कलाउल्ली का जिक्र प्राय: होता है। कारनाड भारतीय सिनेमा में ग्रामोन्मुखी रुझान और नवयथार्थवाद के प्रतिनिधि माने जाते हैं। साठ के दशक में नवीन रंग चेतना और सत्तर के दशक में नए सिनेमा के आंदोलन के प्रेरणादायी सूत्रधारों में उनकी गणना होती है। कारनाड को 1970 में दो वर्ष के लिए रंगकर्म के क्षेत्र में सर्जनात्मक कार्य के लिए होमीभाभा फेलोशिप भी मिली।

भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित

उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए जिनमें 1971 में संगीत नाटक अकादमी, कमला देवी चट्टोपाध्याय पुरस्कार, पद्मश्री, पद्मविभूषण शामिल हैं। उनकी पहली फिल्म संस्कारा राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से पुरस्कृत नेशनल अवार्ड प्राप्त फिल्म है। 1994 में उन्हें कर्नाटक विवि ने डॉक्टर ऑफ लिटेरचर की मानद उपाधि से सम्मानित किया। 1998 में वह रंगकर्म के क्षेत्र में राष्ट्रीय कालिदास सम्मान से विभूषित हुए। इसी वर्ष भारतीय ज्ञानपीठ ने भी उन्हें सम्मानित किया।

उनके निधन सेसंस्कृति कर्मियों में शोक की लहर है। साहित्य और रंगमंच की दुनिया के लोगों यादें साझा कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। अस्मिता थियेटर ग्रुप के संस्थापक अरविंद गौड़ बताते हैं कि वर्ष 1993 में मैंने अस्मिता थियेटर की नींव रखी थी। हमलोग दो या तीन नाटक कर चुके थे और नाटक ‘तुगलक’ के मंचन का मन बना रहे थे। टीम में सभी युवा कलाकार ही थे। थियेटर से जुड़े लोगों तक जब ये खबर पहुंची कुछ लोगों ने मजाक बनाते हुए कहा ‘तुगलक के लिए बड़ा मंच, मझे कलाकार और बेहतरीन पोशाक, साज-सज्जा चाहिए। अरविंद गौड़ मंचन करेंगे तो मजाक ही बनाएंगे’।

खैर, हमने अपनी तैयारी जारी रखी और आठ महीने की कड़ी मेहनत और 4500 रुपये खर्च के बाद ‘तुगलक’ को मंच पर लेकर आए। जगह श्रीराम सेंटर का बेसमेंट जहां मुश्किल से 250 लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। समय हुआ, लोग धीरे-धीरे पहुंचने लगे। नाट्य प्रस्तुति के मध्यांतर तक सभागार में गूंजती तालियों की गड़गड़ाहट कलाकारों की मेहनत पर सफलता की मुहर लगा चुकी थी। मंचन को समाचारपत्रों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया और खबर जब नाटक के लेखक तक पहुंची तो उन्होंने बधाई संदेश भेजा। जाति और वर्ण के ऊपर रचित नाटक ‘रक्त कल्याण’ के साथ भी अस्मिता का मधुर संबंध रहा। दशकों बाद जब उन नाटकों को मुड़कर देखता हूं तो अस्मिता ग्रुप के साथ नाटक से जुड़े जैमिनी कुमार, कंगना रनौत और दीपक डोबरियाल जैसे कई कलाकार बुलंदी पर दिखाई देते हैं। यह जादू है संस्कृति कर्मी गिरीश कारनाड के लेखन का जो कला को कई आकार दे जाता है।

कला-साहित्य के लोगों ने किया याद
प्रसिद्ध लेखक, लोकप्रिय अभिनेता, चर्चित फिल्म निर्देशक और रंग व्यक्तित्व गिरीश कारनाड का सोमवार को 81 साल की उम्र में बेंगलुरु में निधन हो गया। साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और कालिदास सम्मान से पुरस्कृत पद्म भूषण गिरीश कारनाड को राजधानी के कला और साहित्य प्रेमियों ने भी विनम्र श्रद्धांजलि दी।

उनके निधन से भारतीय साहित्य, संस्कृति और रंग-जगत को बड़ी क्षति हुई है। उनके देहावसान से जो अवकाश निर्मित हुआ है उसे भरा नहीं जा सकता। साहित्य-जगत और साहित्य अकादमी की ओर से गिरीश कारनाड के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि। 

डॉ. के. श्रीनिवासराव (सचिव, साहित्य अकादमी) का कहना है कि भारतीय रंगमंच को पढ़ते हुए जो नाम पहले अध्याय में आता है वो मोहन राकेश, विजय तेंदुलकर, धर्मवीर भारती के साथ-साथ गिरीश कारनाड का है। जाहिर है, थियेटर की ओर जब मेरा झुकाव हुआ तो उनकी कृति ‘यताति‘, ‘तुगलक’और ‘हयवदन’ से होकर गुजरा। पुस्तक की एक-एक पंक्तियों ने मुझपर गहरी छाप छोड़ी, लेकिन वर्ष 1987-88 में जब साहित्य अकादमी के एक समारोह में उनसे सामना हुआ तो मैं उनका मुरीद हो गया। दरअसल, मैं उन दिनों थियेटर की बारीकियां पढ़-समझ रहा था तो मेरे मन में कई सवाल थे। मैंने गिरीश साहब से पूछना शुरू किया तो आयोजकों में जो ‘साहब’ लोग थे उन्हें खटक गया और वो मुङो बैठने के लिए कहने लगे। गिरीश कारनाड मंच पर माइक लेकर खड़े हो गए और रोकने वालों से कहने लगे ‘सवाल पूछना उनका अधिकार है और जवाब देना मेरा कर्तव्य। आप इसमें बाधा न बनें।’

यादों का लंबा सिलसिला है। उनको देखना, उनके पास होना, उनसे बातचीत करना, उनके नाटकों को पढ़ना, देखना और मंच पर उतारना खुद में विचारोत्तेजक विकास का माध्यम रहा है। - अरविंद गौड़, संस्थापक, अस्मिता थियेटर ग्रुप

एक नाटककार के रूप में गिरीश कारनाड ने मुझे हमेशा प्रभावित किया है। मैंने बहुत साल पहले अपने पसंदीदा नाटक ‘तुगलक’ को भिखारी ठाकुर की नाट्य शैली में रूपांतरित किया था। बहुत मन था कि उसका मंचन भी हो परंतु भिखारी ठाकुर के रंगमंच को पुनर्जीवित करने की व्यस्तताओं में यह कार्य पूर्ण नहीं हो सका। परंतु कभी न कभी गिरीश कारनाड के तुगलक नाटक को भिखारी ठाकुर के संगीत एवं नाच शैली में मैं जनता के समक्ष जरूर लाऊंगा। ये मेरी तरफ से गिरीश कारनाड को श्रद्धांजलि होगी। - डॉ. जैनेंद्र दोस्त रंगकर्मी

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Posted By: JP Yadav