फरीदाबाद [सुशील भाटिया]। सात दशक पूर्व देश विभाजन के बाद उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत के छह जिलों बन्नू, हजारा, कोहाट, मर्दान, पेशावर और डेरा इस्माइल खान से आए करीब 35 हजार विस्थापितों को बसाने के लिए औद्योगिक नगरी एनआइटी फरीदाबाद की स्थापना की गई थी। इनमें हजारों विस्थापित अपना सब कुछ वहीं छोड़ कर तन पर कपड़े और हाथों में ली कपड़ों की गठरी के साथ अपना जीवन शुरू किया था। फिर अपने पुरुषार्थ से न सिर्फ अपनी कर्मस्थली व अपने बच्चों की जन्म स्थली को सजाया संवारा, बल्कि औद्योगिक नगरी का नाम विश्व स्तर पर चमकाया। ऐसे पुरुषार्थियों की खुशी व उल्लास हर त्योहार, पर्व में झलकता है चाहे वो दशहरा पर्व आदि हो या फिर लोहड़ी।

फिलहाल बात लोहड़ी की ही करेंगे। जिन घरों में पिछली लोहड़ी के बाद से बेटों की शादी हुई है या उनका घर-आंगन में बेटे-पोते की किलकारियों से गूंजा है, तो वहां तो परंपरागत रूप से गज-वज के यानी ढोलों की थाप पर नाचते हुए और मालपुए, खीर जैसे पकवानों का स्वाद लेकर लोहड़ी मनाई ही जाती है, अब पिछले कुछ वर्षों से शहरवासियों ने इससे भी आगे बढ़ कर प्रगतिशील सोच का परिचय देते हुए अपनी लाडलियों के जन्म पर भी लोहड़ी मनाने की परंपरा शुरू की है।

एनआइटी निवासी नितिन-चांदनी गेरा, गौरव-वंदना, मुकुल-अंजलि ग्रोवर, जवाहर कॉलोनी निवासी परमिंदर सिंह-इंद्रजीत कौर ऐसे जागरूक निवासी हैं, जिन्होंने अपनी बेटियों की लोहड़ी मनाने की तैयारी की है। ऐसे जागरूक लोगों ने बेटों की चाह में गर्भ में बेटियों को मार देने वाले अभिभावकों को कुछ सोचने पर विवश करने का संदेश दिया है। दैनिक जागरण ने ऐसे जागरूक अभिभावकों से बातचीत कर उनके विचारों को पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया।

परमंदिर सिंह-इंद्रजीत कौर (जवाहर कॉलोनी) का कहना है कि हम लोगों ने यह पहले ही निर्णय ले लिया था कि बेटा हो या बेटी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा और हम इस खुशी में लोहड़ी मनाएंगे। हमारे यहां बेटी हुई, जिसका नाम हमने हरलीन कौर रखा है। वाहेगुरु का शुक्र है। इससे पहले जब बेटी के जन्म के बाद मां-बेटी अस्पताल से घर आए थे, तब भी ढोलों के साथ घर पर स्वागत हुआ था। वैसे भी बेटियां मां-बाप की ज्यादा प्यारी होती हैं।

मुकुल-अंजलि ग्रोवर (एनआइटी दो ई ब्लॉक) की मानें तो हमारा परिवार बेटी ही चाहता था और नवंबर में भगवान की कृपा से बेटी ही हुई। बेटी-बेटा एक समान है, जब बेटों की लोहड़ी मनाई जाती है, तो बेटियों की क्यों नहीं। हमें बेटी भविक्षा की भी उतनी ही खुशी है।

 

नितिन-चांदनी गेरा (एनआइटी दो सी ब्लॉक) बताते हैं कि हमारी बेटी अमायरा के जन्म से जुड़ी खास बात यह है कि दिवाली वाले दिन वो इस संसार में आई यानी लक्ष्मी का खास उपहार। इसलिए हम भगवान से अनमोल उपहार मिलने पर लोहड़ी मना रहे हैं और मित्रों-नाते, रिश्तेदारों संग खुशियों को साझा करेंगे।  

गौरव-वंदना (एनआइटी फरीदाबाद निवासी) का कहना है कि पीएम नरेंद्र मोदी का बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ का नारा भी तभी सार्थक होगा, जब सभी लोग इसे मन से स्वीकार करेंगे और बेटियों को हर कदम पर आगे बढ़ाने में सहयोग करेंगे।

हम 12 जनवरी की शाम बेटी अनायरा के जन्म की पहली लोहड़ी पर खास आयोजन कर रहे हैं, माता की चौकी और उसके बाद सभी आमंत्रितों के लिए रात्रि भोज का प्रबंध है।

Posted By: JP Yadav