नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। मुस्कारते बच्चों को खिलौने न सिर्फ बीमार बना सकते हैं, बल्कि उनका शारीरिक विकास भी थाम सकते हैं। यही नहीं रि-साइकिल प्लास्टिक से बने इन खिलौनों से बच्चों के कैंसर जैसी बीमारी की चपेट में आने का भी खतरा है। जी हां, पढ़ने या सुनने में ये कुछ अटपटा भले ही लगे, लेकिन यह तथ्य पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे अग्रणी गैर सरकारी भारतीय संगठन टॉक्सिक लिंग एवं अंतरराष्ट्रीय संगठन आइपैन की एक संयुक्त शोध रिपोर्ट में सामने आया है। यह शोध रिपोर्ट गत सप्ताह ही आई है।

ऐसा था इस शोध का स्वरूप
यह शोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किया गया था। इसके तहत नाइजीरिया, रूस, फ्रांस, लेटिन अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिण एशिया, नीदरलैंड और भारत में दिल्ली से खिलौनों के नमूने लिए गए। सभी नमूने रि- साइकिल प्लास्टिक से बने खिलौने थे। इनकी जांच नीदरलैंड की प्रयोगशाला में किए जाने के बाद यह रिपोर्ट जारी की गई है।

उच्च मात्र में मिला डायोक्सीन
रि-साइकिल प्लास्टिक से बने सभी खिलौनों में स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक डायोक्सीन रसायन उच्च मात्रा में पाया गया। दिल्ली से लिए गए खिलौनों में इसकी मात्र 690 प्रतिग्राम टीएफ क्यू (टॉक्सिक इक्वीलेंट कोसेंट) तक मिली। इसमें भी ब्रोमिनेटिड डायोक्सीन बहुत अधिक पाया गया। इससे बच्चे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं।

पीयूष महापात्र (सीनियर प्रोग्राम कॉर्डीनेटर, टॉक्सिक लिंक) का कहना है कि प्लास्टिक और ई कचरे को जलाने के क्रम में डायोक्सीन राख या धुएं के रूप में हवा और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाता है। मानव निर्मित पदार्थों में डायोक्सीन सर्वाधिक खतरनाक होता है। रि-साइकिल प्लास्टिक के उत्पादों खासकर खिलौनों में तो इसे नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है।

डॉ. के के अग्रवाल  (पूर्व अध्यक्ष, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) की मानें तो  जिस भी उत्पाद में रसायनों का प्रयोग हो, उसके उपयोग में सावधानी बरतना निहायत जरूरी है। वैसे भी इन दिनों यह पता लगाना मुश्किल होता जा रहा है कि कौन से केमिकल किस हद तक सेहत को नुकसान पहुंचा जाएं। इसलिए एहतियात बरतने में ही सुरक्षा रहती है।
 
एक किलोग्राम में 50 ग्राम से ज्यादा न हो मात्रा
टॉक्सिक लिंक के एसोसिएट निदेशक सतीश सिन्हा का कहना है कि अगर बच्चों को रि- साइकिल प्लास्टिक से बने खिलौनों के दुष्प्रभाव से बचाना है तो एक किलोग्राम रि साइकिल प्लास्टिक में डायोक्सीन की मात्र 50 ग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए।

डायोक्सीन निर्धारण के लिए कोई मानक तय नहीं
डायोक्सीन रसायन प्लास्टिक और ई कचरे को जलाने के दौरान उत्पन्न होता है। रि-साइकिल किए गए प्लास्टिक में इसकी मात्र निर्धारण के लिए कोई मानक तय नहीं है। वहीं प्लास्टिक के खिलौने बनाने की फैक्टियां दिल्ली एनसीआर सहित देश- विदेश में भी जगह-जगह धड़ल्ले से चल रही हैं।

जानलेवा है डायोक्सीन
रिपोर्ट के अनुसार जब कोई बच्चा इन खिलौनों से खेलता है तो वह उन्हें मुंह में ले जाता है। त्वचा के साथ भी इन्हें रगड़ता है। इससे यह रसायन शरीर में चला जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों के दिमागी विकास, रोग प्रतिरोधक क्षमता और थॉयरायड सिस्टम को प्रभावित करने के साथ- साथ डायोक्सीन कैंसर का कारक भी है।

ये सावधानियां रखें

  • हमेशा खिलौने गुणवत्ता को परखकर ही खरीदें।
  • बेहद तेज रंग या नुकीले किनारों वाले खिलौनों से बचें।
  • बच्चों के लिए वर्चुअल खेलों और फिजिकल एक्टिविटीज दोनों में इन्वॉल्व होने का एक नियम बनाएं और उसे लागू करें।
  • सॉफ्ट टॉयज तथा रबर के खिलौने समय-समय पर धोते और साफ़ करते रहें।
  • बैटरी वाले खिलौनों के साथ छोटे बच्चों को अकेला न छोड़ें और समय-समय पर यह चैक करें कि बैटरी लीक तो नहीं हो रही।
  • बच्चों को खिलौने मुंह में लेने से रोकें। इसकी बजाय उन्हें गाजर, ककड़ी, मठरी जैसी चीजें पकड़ा दें।
  • यदि बच्चे को रैशेज, फुंसियां आदि हो रही हों या पेट की तकलीफ हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

Posted By: JP Yadav