नई दिल्ली [विवेक शुक्ला]। 17वीं लोकसभा यानी 1980 का आम चुनाव देश पर थोपा ही गया था। केंद्र में जनता पार्टी की सरकार अपने शिखर नेताओं के आपसी कलह-क्लेश के कारण गिर गई थी, इसलिए देश फिर से नई लोकसभा को चुन रहा था। इस पृष्ठभूमि में हो रहे आम चुनाव में संकेत मिल गए थे कि कांग्रेस की केंद्र में वापसी होने जा रही है। दिल्ली में भी कांग्रेसी तैयार थे जनता पार्टी से 1977 की हार का बदला लेने के लिए। कांग्रेस नेतृत्व ने सात सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी, पर प्रतिष्ठित दक्षिण दिल्ली सीट से उसने एक ऐसे इंसान को अपना उम्मीदवार बनाया जिसका राजनीतिक हलकों में किसी ने नाम नहीं सुना था। वो नाम था चरणजीत सिंह का।

जब नामांकन का समय आया तो पता चला कि चरणजीत सिंह कोका कोला कंपनी के भारत में मालिक हैं। वे अरबपति थे। उनके पिता सरदार मोहन सिंह ने भारत में कोका कोला के बिजनेस को शुरू किया था। वे नई दिल्ली नगर पालिका (एनडीएमसी) के भी नामित उपाध्यक्ष थे। हर लिहाज से ताकतवार इंसान थे। तब जिसकी 1500 रुपये सैलरी होती थी, उसे संपन्न मान लिया जाता था। तब तक देश में आर्थिक उदारीकरण का दौर आना बाकी था। इसलिए चरणजीत सिंह के मैदान में आने से जिज्ञासा बढ़ गई।

जनता उनके बारे में जानने को उत्सुक थी। उनके मुकाबले जनता पार्टी ने मैदान में उतारा दिल्ली के पुराने तपे हुए नेता प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा को। वो 1977 में भी इसी सीट से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। उनकी साफ-सुथरी छवि थी। कभी दिल्ली की लाइफलाइन समझी जाने वाली 87 किलोमीटर लंबी रिंग रोड को वे ही लेकर आए थे। ये उनकी परिकल्पना थी।

बहरहाल पहली नजर में दक्षिण दिल्ली में मुकाबला कांटे का होता नजर आ रहा था। लोग कह रहे थे मल्होत्रा जी आराम से सीट निकाल लेंगे, पर ये हो ना सका। जनता पार्टी के बिखरने से देश की तरह दिल्ली भी नाराज थी। मतदाता खुद को ठगा महसूस कर रहे थे। उन्हें लग रहा था कि भारत में गैर-कांग्रेसवाद का प्रयोग सफल ही नहीं हो सकता। उस चुनाव की कैंपेन में भी कांग्रेस काफी आक्रामक थी। दूसरी तरफ जनता पार्टी शुरू से ही कमजोर नजर आ रही थी। उसके उम्मीदवारों को समझ नहीं आ रहा था कि कैसे जनता के चुभते सवालों का जवाब दें।

उधर, चरणजीत सिंह अपनी चुनावी सभाओं में वक्ता के रूप में कोई छाप नहीं छोड़ पा रहे थे। चूंकि वे कांग्रेस से थे इसलिए उनके पक्ष में माहौल तो बन गया था। दिल्ली की राजनीति को जानने वाले कह रहे थे कि अगर वे हारेंगे भी तो बहुत कम अंतर से। वे कैंपेन में पैसा भी खूब खर्च कर रहे थे। उस दौर में चुनाव आयोग का चाबुक आज की तरह नहीं चलता था।

उम्मीदवारों के खर्च पर आज की तरह नजर भी नहीं रखी जाती थी। कैंपेन के बाद मतदान और फिर चुनाव के नतीजे आ गए। पहली बार राजनीति की दुनिया में कदम रखने वाले चरणजीत सिंह ने विजय कुमार मल्होत्रा को शिकस्त दी। इस तरह दिल्ली ने पहली बार लोकसभा में किसी सिख सांसद को भेजा।

उन्होंने मल्होत्रा को लगभग एक लाख मतों से शिकस्त दी। उनसे पहले या बाद में कभी दिल्ली से कोई सिख लोकसभा नहीं पहुंचा। चरणजीत सिंह ने बाद में होटल ली मेरिडियन भी खोला। उन्होंने 1980 के बाद फिर कभी राजनीति में हाथ नहीं आजमाया।

(लेखक इतिहासकार भी हैं)

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Posted By: JP Yadav

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