नई दिल्‍ली, जेएनएन। काकोरी कांड देश के इतिहास में एक ऐसी घटना थी जिसने हर देशवासियों के दिल में पल रही अंग्रेजी शासन के खिलाफ नफरत के बारूद में आग लगा दी थी। 9 अगस्‍त 1925 के दिन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के सामने एक ऐसा जज्बा दिखाया जो फिरंगियों के मुंह पर तमाचे के समान था, क्रांतिकारियों की ये धमक सात समंदर पार इंग्‍लैड तक जा पहुंची। हिंदुस्‍तान रिपब्‍लिक एसोसिएशन के मात्र 10 क्रांतिकारियों ने काकोरी (उत्तर प्रदेश) में एक ट्रेन में डकैती डाली। काकोरी कांड के लिए अंग्रेजों ने राम प्रसाद बिस्‍मिल, अशफाक उल्‍लाह खां और रोशन सिंह को 19 दिसंबर, 1927 को फांसी दी गई थी। इस दिन को देश बलिदान दिवस के रुप में मनाता है।

क्‍या है काकोरी कांड
राम प्रसाद बिस्‍मिल, अशफाक उल्‍लाह खां, राजेंद्र लाहिड़ी एवं चंद्रशेखर आजाद सहित 10 क्रांतिकारी जो देश के लिए जीने-मरने की कसम खा रहे थे, उन्‍होंने काकोरी रेलवे स्‍टेशन से चली सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन की चेन खींच कर रोक ली और उसमें रखे अंग्रेजों का खजाना लूट लिया। इन देशभक्‍तों का मानना था कि देश की आजादी की जंग में हथियार खरीदने के लिए पैसे की जरूरत होगी, जो ट्रेन लूटने से काफी हद तक पूरी हो सकती है।

सभी क्रांतिकारी थे एचआरए के सदस्‍य
काकोरी कांड को अंजाम देने वाले क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्‍तान रिपब्‍लिक एसोसिशएन के सदस्‍य थे। इस संगठन की स्‍थापना 1923 में शचीन्‍द्रनाथ सान्‍याल ने की थी। इस क्रांतिकारी दल का काम देश की लड़ाई के लिए पैसे का इंतजाम करना था। इसके लिए इसके सदस्‍य डकैती तक डालने से परहेज नहीं करते थे। इस काम के कारण सरकार क्रांतिकारियों को चोर या डाकू कह कर उन्‍हें समाज से अलग करने का प्रयास कर रही थी। सरकार के ऐसे प्रयास के बाद क्रांतिकारियों ने सिर्फ सरकारी खजाना लूटने का प्रयास किया। काकोरी कांड इसकी एक अहम कड़ी बनी।

ऐसे हुआ था खुलासा
ट्रेन लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर रुक कर जैसे ही आगे बढ़ी तभी क्रांतिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया। इसके बाद भाग कर गार्ड के डब्‍बे के पास पहुंचे। सभी को पता था सरकारी खजाना वहीं है। गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा खींच कर नीचे गिरा दिया और खोलने की कोशिश में लग गए। काफी कोशिश के बाद भी जब बाक्स नहीं खुला, तब अशफाक उल्ला खां ने अपना तमंचा मन्मथनाथ गुप्त को पकड़ा दिया और हथौड़ा लेकर बक्सा तोड़ने में जुट गए। इसी वक्‍त एक हादसा हुआ। मन्मथनाथ गुप्त की गलती से तमंचे का घोड़ा दब गया और ट्रेन में यात्रा कर रहे अहमद अली नाम के मुसाफिर की मौत हो गई। बक्‍सा तोड़ने के बाद क्रांतिकारियों ने खजाने को चादर में समेट कर भागने लगे। इसी दौरान क्रांतिकारियों की एक चादर घटनास्थल पर ही छूट गई। जिसके बाद अंग्रेज पुलिस पड़ताल करते हुए शाहजहांपुर पहुंच गई, जहां चादर पर लगे निशान से पता चला कि यह चादर बनारसीलाल की है। इसके बाद तो सारा भेद पुलिस के सामने खुल गया। बिस्मिल के साझीदार बनारसीलाल से जानकारी लेकर पुलिस ने देश भर मेें छापेमारी शुरू कर दी।

काकोरी कांड का दिल्‍ली कनेक्‍शन
काकोरी कांड के बाद देश भर से छापेमारी का दौर शुरू हो गया। इसके बाद पुलिस ने देश भर के करीब डेढ़ दर्जन शहरों से 50 लोगों को गिरफ्तार किया था। इसी में एक शख्‍स था जो इस कांड को अंजाम देने में आगे रहा था, वह था अशफाक उल्‍ला खां। अशफाक पुलिस की नजरों से बचने के लिए दिल्‍ली की गलियों में छुपे थे, मगर किस्‍मत ने उनका साथ नहीं दिया और वह पकड़े गए। इसके बाद राम प्रसाद बिस्‍मिल, अशफाक उल्‍ला खां और रोशन सिंह को फांसी के तख्‍त पर लटका दिया। आजादी के प्रेमी इन तीनों दीवानों को 19 दिसंबर, 1927 को ही फांसी की सजा सुनाई गई थी, जिसे हम बलिदान दिवस के रूप में मनाते हैं।

Posted By: Prateek Kumar

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप