नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]  वायु प्रदूषण का काला साया देश के भविष्य को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। 14 वर्ष तक के बच्चे फेफड़ों के संक्रमण से अल्पायु में ही विभिन्न बीमारियों का शिकार हो रहे हैं, काल का ग्रास भी बन रहे हैं। दिल्ली में प्रति एक लाख पर 42 बच्चों की हर साल मौत हो रही है। चिंताजनक बात यह है कि प्रदूषण की मार से बच्चे घर के भीतर भी सुरक्षित नहीं हैं।

ग्लोबल बर्डन डिजीज स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक, वायु प्रदूषण के प्रमुख प्रदूषक तत्व पीएम 2.5 के महीन कण सांसों के जरिये शरीर में प्रवेश कर सीधे निचले फेफड़ों पर असर डालते हैं। यह प्रदूषक तत्व बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।

रिपोर्ट में चौकाने वाला खुलासा

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर), पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआइ) व इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मीट्रिक एंड इवोल्यूशन (आइएमएमई) के सहयोग से तैयार इस रिपोर्ट में 2017 तक के आंकड़े हैं। इसी आधार पर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने अपनी हाउस पत्रिका डाउन टू अर्थ में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है।

रिपोर्ट के मुताबिक मनुष्य के सिर के एक बाल का व्यास 50 से 70 माइक्रोन होता है, जबकि पीएम 2.5 के कण इससे भी महीन होते हैं। 24 घंटे के आधार पर पीएम 2.5 का सामान्य स्तर 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होता है। लेकिन दिल्ली सहित ज्यादातर शहरों में पूरे साल इसका स्तर इससे ज्यादा रहता है। जर्नल एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित एक शोध ने भी पीएम 2.5 को वैश्विक रोगों के लिए जिम्मेदार माना है।

दुनिया में भारत चौथे नंबर पर

2017 में वायु प्रदूषण के कारण हुई मौतों को लेकर जारी प्रतिष्ठित जर्नल द लैंसेट की रिपोर्ट के मुताबिक पीएम 2.5 के मामले में भारत नेपाल, नाइजीरिया, कतर के बाद दुनिया में चौथे स्थान पर है। 2017 में भारत का सालाना औसत पीएम 2.5 स्तर 89.8 था, जो सामान्य से पांच गुना ज्यादा है। हरियाणा में घर के भीतर ठोस ईंधन के धुएं से एक लाख बच्चों की आबादी में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 39.62 है। ग्लोबल बर्डन डिजीज रिपोर्ट बताती है कि वायु प्रदूषण के कारण पांच वर्ष तक के बच्चों का जीवन सर्वाधिक जोखिम में है। 2017 में इस आयुवर्ग में देश में 10.35 लाख बच्चों की मौत हुई हैं। इनमें से 1.85 लाख मौतें निचले फेफड़ों के संक्रमण से ही हुई हैं।

जहरीली हवा से मरने वाले बच्चों की उम्र अधिकतर 5 साल से कम

सीएसई के कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉय चौधरी ने बताया कि भारत में जहरीली हवा के कारण पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सर्वाधिक मौतें हो रही हैं। यह बेहद चिंताजनक है। घर के भीतर और बाहर दोनों ही जगह बच्चे ऐसी हवा में सांस लेने को मजबूर हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइंस के अनुरूप नहीं है। सुधार के लिए प्रयास शुरू हुए हैं, लेकिन अभी ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं।

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Posted By: Mangal Yadav

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