नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। वायु प्रदूषण के चलते प्रत्येक वित्तीय वर्ष में भारतीय व्यापार जगत को करीब 95 अरब अमेरिकी डालर (7 लाख करोड़ रुपये) का नुकसान उठाना पड़ता है। जो देश की कुल जीडीपी का लगभग तीन फीसद है। यह नुकसान सालाना कर संग्रह के 50 फीसद के बराबर है और भारत के स्वास्थ्य बजट का डेढ़ गुना है। यह निष्कर्ष है उस शोध रिपोर्ट का जो डलबर्ग एडवाइजर्स ने क्लीन एयर फंड और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआइआइ) के सहयोग से तैयार की है। यह रिपोर्ट वायु प्रदूषण के भारी आर्थिक नुकसान के साथ-साथ स्वास्थ्य पर इसके विनाशकारी प्रभावों को सामने रखते हुए वायु प्रदूषण से निपटने के लिए तत्काल सक्रिय होने पर जोर देती है।

डलबर्ग का अनुमान है कि भारत के कामगार अपने स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभावों के कारण प्रति वर्ष 130 करोड़ कार्यदिवसों की छुट्टी लेते हैं, जिसके चलते छह अरब डालर के राजस्व का नुकसान होता है। चूंकि वायु प्रदूषण का श्रमिकों के मस्तिष्क और शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है और इससे उनकी उत्पादकता कम होती है। इस व्यापार राजस्व में 24 अरब डॉलर तक की कमी आती है। इसका प्रभाव राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

रिपोर्ट में पाया गया है कि वायु की निम्न गुणवत्ता भी उपभोक्ताओं की अपने घरों से बाहर निकलने की इच्छा को कम करती है। जिससे बाजार में उपभोक्ताओं की पहुंच घटती है और अंतत: सीधे उपभोक्ता से जुड़े व्यवसायों को 22 अरब अमेरिकी डालर के राजस्व का घाटा होता है। बता दें कि भारत पिछले दशक में दुनिया का पांचवां सबसे प्रदूषित देश बन गया है और दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 21 भारत में हैं।

वायु प्रदूषण से 17 लाख लोगों की हुई मौत

वर्ष 2019 में भारत में वायु प्रदूषण से 17 लाख लोगों की अकाल मौत हुई है जो उस वर्ष देश में हुई सभी मौतों का 18 फीसद थी। 2030 तक इस आंकड़े के और बढ़ने की आशंका है। इससे भारत उन प्रमुख देशों में शामिल हो जाएगा जहां समय पूर्व मृत्यु दर से वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि भारत का आइटी क्षेत्र जो देश के जीडीपी में नौ फीसद का योगदान देता है, उसकी प्रदूषण के चलते उत्पादकता प्रभावित होती है। इससे 1.3 अरब डालर का नुकसान उठाना पड़ता है। यदि वर्तमान में अनुमानित दरों पर वायु प्रदूषण में वृद्धि जारी रहती है, तो यह आंकड़ा 2030 तक लगभग दोगुना हो सकता है।

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