नई दिल्ली [अभिनव उपाध्याय]। भारत ही नहीं विश्व में अंग्रेजी और कुछ भाषाओं के बढते वर्चस्व के कारण मातृ भाषाओं का दायरा सिमटता जा रहा है। ऐसी स्थिति तब है जब भाषा विज्ञानी और शिक्षाविद यह भी साबित कर चुके हैं कि मातृभाषा में शिक्षा दिए जाने और मातृभाषा में विदेशी या अन्य भाषा पढ़ाए जाने से बच्चा उसे तेजी से सीखता है। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में मातृ भाषाएं मृत हो गई हैं या मृत प्राय हो गई हैं।

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल आफ लैंग्वेज में प्राध्यापक डा.गंगा सहाय मीणा का कहना है कि यह चिंता का विषय है कि भारत में मातृ भाषाएं ही नहीं विश्व की मातृ भाषाएं भी सिमट रही हैं। भूमंडलीकरण का एक बडा असर भाषाओं पर भी पड़ा है।

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भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर के सर्वे के जरिए यह चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि पिछले पांच दशक में भारत में बोली जाने वाली 220 से अधिक भाषाएं गायब हो गई हैं। 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1100 से अधिक भाषाएं थीं, जिनकी संख्या अब 880 से भी कम रह गई हैं। यूनेस्को द्वारा बनाए गए इंटरेक्टिव एटलस में दुनिया की लगभग 6 हजार भाषाओं में से 2471 खतरे में है।

इस मानचित्रावली के अनुसार भारत की कुल 197 भाषाएं खतरे की स्थिति में हैं। इनमें से 81 पर लुप्त होने का खतरा है, 63 पर लुप्त होने का गंभीर खतरा है, 6 बहुत गंभीर खतरे में हैं, 42 लुप्त प्राय हैं और 5 भाषाएं हाल ही में लुप्त हो चुकी हैं।

डा. मीणा बताते हैं कि हम गौर करेंगे पायेंगे कि जो भाषाएं हाल ही में लुप्त हुई हैं या लुप्त होने के कगार पर खड़ी हैं, उनको बोलने वाले समुदाय भी लुप्त हो रहे हैं। अस्तित्व की रक्षा के लिए उन्हें अपनी सांस्कृतिक विरासत को छोड़ना पड़ा है।

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केंद्रीय हिंदी निदेशालय और राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद के निदेशक प्रो.रवि टेकचंदानी का कहना है कि भारतीय भाषाओं का दायरा सिमट रहा है। भारतीय भाषाओं को पढाने के लिए अंग्रेजी क्यों माध्यम बने कोई भारतीय भाषा क्यों नहीं। यदि संस्कृत, गुजराती या सिंधी पढ़ानी हो तो किसी भारतीय भाषा में क्यों न पढाया जाए इसे मातृ भाषाओं का संरक्षण होगा।

दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो.मोहन का कहना है कि हिंदी के साथ जुड़कर अन्य भाषाएं समृद्ध हुई हैं। वस्तुत: मातृभाषा आदमी के संस्कारों की संवाहक है। मानव शिशु का पहला भाव मातृभाव और पहली भाषा मातृभाषा ही होती है। मातृभाषा ही सबसे पहले मनुष्य को सोचने समझने और व्यवहार की अनौपचारिक शिक्षा और समझ देती है।

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर मानते थे कि जिस तरह हमने मां की गोद में जन्म लिया है, उसी तरह मातृभाषा की गोद में भी जन्म लिया है। भाषा आदमी को रचती है और उसमें तमाम विशेषताओं, क्षमताओं और मूल्य दृष्टियों को भी स्थापित करती है। मातृभाषाओं के बिना राष्ट्रीय, स्थानीय अथवा जातीय संस्कृति की कल्पना भी संभव नहीं है।

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Posted By: Amit Mishra