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नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। यह विडंबना है कि विश्व में बोली जाने वाली सभी भाषाओं में तीसरे स्थान पर काबिज हिंदी को देश की आजादी से काफी पहले से ही चुनौतियां मिलती आई हैं। राष्ट्रवादी चिंतक और समाज सुधारक रहे माधवराज सप्रे ने 1916 में भी हिंदी की चिंता की थी और आज भी हमें हिंदी की चिंता करनी पड़ रही है। ये बातें सान्न्ध्यि कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र के दौरान हिंदी का भविष्य विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी ने कहीं।

उन्होंने कहा कि माधवराज सप्रे ने उस समय भी हिंदी की चिंता करते हुए कहा था कि हिंदी ऐसी होनी चाहिए, जो सर्वव्यापी हो। उसे सर्वग्राही कैसे बनाया जाए और हिंदुओं की हिंदी कैसी हो। राष्ट्रपिता बापू ने भी हिंदी की चिंता की थी। उन्होंने राष्ट्रभाषा और लिपि को लेकर कई बातें कही थीं। कई लिपियों का होना हिंदी के विकास में बाधक बना है। हिंदी का कल्याण तभी संभव है, जब प्रांतीयता को छोड़कर, अपनी निजी बोली का मोह छोड़कर देवनागरी को अपना लिया जाए। राष्ट्रभाषा वह हो सकती है, जो सरकारी नौकरों की समझ में आ सके। जो भारत के सभी धार्मिक, आर्थिक व राजनीतिक विचारों को समेटने वाली हो। भाषा राष्ट्र के लिए आसान हो और भाषा का विकास करने के लिए क्षणिक और तात्कालिक स्थिति पर ज्यादा जोर न दिया जाए। ऐसे में हिंदी पहले ही राष्ट्रभाषा बन चुकी है।

जोशी ने कहा कि हमने हिंदी को कभी अपने अंदर पनपने ही नहीं दिया। हिंदी को हमने कमजोर नब्ज बना लिया है। अगर हम हिंदी को कमजोरी के बजाय अपनी ताकत मान लें तो हिंदी को विश्व भाषा बनने से कोई नहीं रोक सकता। हिंदी रिश्ते बनाती है और अंग्रेजी तोड़ती है। हिंदी बाजार की भाषा है। इसे समृद्ध करना हमारी जिम्मेदारी है। कंप्यूटर ज्ञान का नहीं, जानकारी का माध्यम है। कंप्यूटर से वही जानकारी मिलती है, जो उसमें डाली जाती है। हिंदी को कंप्यूटर में डाला ही नहीं गया।

यह हमारी जिम्मेदारी है कि हिंदी की सामग्री इंटरनेट पर डाली जाए। उन्होंने आह्वान किया कि कम से कम दो घंटे रोज हिंदी में रचनात्मक कार्य करें। हिंदी का बहुत बड़ा बाजार है, बाजार का मोहरा बनने के बजाय हिंदी को बढ़ाया जाए। हिंदी को भाषा के स्तर पर ही बढ़ावा दिया जाए। ऐसी नई बारहखड़ी तैयार करें, जो समय के अनुकूल हो।

Posted By: Shashank Pandey

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