नई दिल्ली, जेएनएन। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (All India Institute Of Medical Science) में एशिया का सबसे बड़ा बर्न एवं प्लास्टिक सर्जरी सेंटर बनकर तैयार है। उसमें चिकित्सकीय सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। इस साल के अंत तक इसे शुरू कर दिया जाएगा। यह जानकारी एम्स में राष्ट्रीय प्लास्टिक सर्जरी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में संस्थान के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने दी।

इस सेंटर में त्वचा बैंक सहित तमाम अत्याधुनिक सुविधाएं मौजूद होंगी, इसलिए यहां हाथ प्रत्यारोपण भी संभव हो सकेगा। इस बर्न सेंटर की क्षमता 102 बेड होगी, जिसमें 30 आइसीयू बेड शामिल होंगे। बर्न के मामले में संक्रमण होने की आशंका ज्यादा रहती है, इसलिए सभी आइसीयू बेड के लिए अलग-अलग कमरे बनाए गए हैं। साथ ही अत्याधुनिक ऑपरेशन थियेटर भी होगा।

विभाग के प्रमुख डॉ. मनीष सिंघल ने कहा कि एम्स में औसतन हर साल तीन हजार से ज्यादा प्लास्टिक सर्जरी हो रही है। हमारे पास विशेषज्ञ हैंं, इसलिए हेयर प्रत्यारोपण भी कर रहे हैं। सेंटर शुरू होते ही एक से दो साल के अंदर हाथ व फेशियल प्रत्यारोपण भी शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि शुरुआत में करीब 50 बेड के साथ सेंटर में इलाज शुरू होगा।

रिसर्च पर रहेगा जोर

डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा कि इस सेंटर में इलाज के साथ-साथ रिसर्च पर भी जोर दिया जाएगा। हमारा फोकस कॉस्मेटिक से ज्यादा रीकंस्ट्रक्टिव सर्जरी पर है और इसी एजेंडे के तहत काम किया जाएगा, ताकि जरूरतमंद लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाया जा सके। डॉक्टरों का कहना है कि पूरे विश्व में 75 पर्सेंट बर्न के मामले भारत में आते हैं। इसलिए आज देश भर में ऐसे सेंटर और स्पेशलिस्ट की जरूरत है। इसलिए एम्स में बर्न सेंटर शुरू होने से सुविधाओं में विस्तार होगा। मौजूदा समय में सफदरजंग अस्पताल में 100 बेड का बर्न सेंटर है। इसके अलावा आरएमएल व लोकनायक अस्पताल में बर्न व प्लास्टिक सर्जरी की सुविधा है।

एम्स व आइआइटी ने तैयार की कृत्रिम त्वचा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) दिल्ली व एम्स ने मिलकर कृत्रिम त्वचा विकसित की है। इससे जरूरतमंद मरीजों के लिए त्वचा की कमी दूर होगी। फिलहाल इस त्वचा का जानवरों पर ट्रायल चल रहा है। इसके उत्साहजनक नतीजे मिले हैं। अगले साल मरीजों पर क्लीनिकल परीक्षण किए जाने की उम्मीद है। यह देश की महत्वपूर्ण चिकित्सकीय शोध परियोजनाओं में शामिल है। क्लीनिकल परीक्षण पूरा होने पर कृत्रिम त्वचा बहुत ही कम कीमत पर उपलब्ध होगी, जो प्रत्यारोपण के बाद असली त्वचा की तरह काम करेगी।

एम्स के बर्न और प्लास्टिक सर्जरी के प्रमुख डॉ. मनीष सिंघल ने कहा कि प्लास्टिक सर्जरी में स्किन की कमी होती है। कैडेवर डोनेशन से त्वचा बहुत कम मिल पाती है। उत्तर भारत में सिर्फ सफदरजंग अस्पताल में स्किन बैंक है, लेकिन यहां पर नाम मात्र के लिए ही त्वचा दान हुआ है। इसलिए अगर त्वचा की जरूरत होती है तो दक्षिण भारत से मंगानी पड़ती है या मरीज के शरीर के किसी हिस्से से लेनी पड़ती है। ऐसे में एम्स के अंदर त्वचा बैंक खोलना जरूरी है। कृत्रिम त्वचा विकसित होने से इस समस्या का निदान भी होने की उम्मीद है। आइआइटी ने इसे विकसित कर लिया है। एम्स में चूहों पर किया गया इसका ट्रायल सफल रहा है, जबकि सुअरों पर ट्रायल अभी चल रहा है। इसके बाद क्लीनिकल परीक्षण के लिए ड्रग कंट्रोलर से स्वीकृति की जाएगी। उन्होंने कहा कि कई प्रकार के केमिकल्स व फाइबर का इस्तेमाल कर इसे तैयार किया गया है। उम्मीद है कि डेढ़-दो साल में कृत्रिम त्वचा उपलब्ध हो जाएगी। 40 फीसद तक बर्न के मामले में स्किन की जरूरत होती है। हर साल देश में करीब एक लाख लोगों को त्वचा प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है।

 

Posted By: JP Yadav

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