अंशु सिंह। प्रसिद्ध समाजसेविका सुनीता कृष्णन का कुछ समय पूर्व 49वां जन्मदिन था। हर वर्ष की तरह इस बार भी वे अपने माता-पिता की शुभकामनाओं का इंतजार कर रही थीं। लेकिन फोन नहीं आया, क्योंकि दोनों ही कोविड के कारण अस्पताल में भर्ती थे और उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। बेखौफ होकर अनेक लड़ाइयां लड़ने वाली योद्धा सुनीता उनके स्वास्थ्य को लेकर परेशान एवं व्यथित थीं। लोगों से दुआओं की अपील कर रही थीं और आखिरकार दुआओं का असर हुआ। माता-पिता घर वापस आ गए।

कहती हैं कि अगर माता-पिता नहीं होते, तो वे अपने सपने को कभी जी नहीं पाती। उन्होंने बिना शर्त वह आजादी एवं स्पेस दिया, जिससे वह अपने मन का कर पाईं। वर्षों कारपोरेट में अपनी सेवाएं देने के बाद स्वैच्छिक सेवाओं के प्रति खुद को समर्पित करने वाली चेन्नई की आरती मधुसूदन कहती हैं, ‘मेरे डैड,मां से कम नहीं हैं। बचपन में वे हम दोनों बहनों के बालों को धोने से लेकर उसमें तेल लगाया करते थे। जब बड़े हुए, तो उनसे अपने निजी इस्तेमाल की वस्तुएं मांग लिया करते थे और वे लाकर दिया भी करते थे। शादी के बाद मैं मां बनी, तब भी वे मेरे साथ वाक पर जाते थे। बेटी हुई, तो रात-रात भर जागते थे। मेरे लिए काफी बनाते थे। उनका नि:स्वार्थ प्रेम आज भी कायम है।‘

पिता की जरूरतों को समझने का प्रयास: लेखिका संयुक्ता बासु अपने 75 वर्षीय पिता के साथ रहती हैं। मां के गुजरने के बाद दोनों ही एक-दूसरे का सहारा रहे हैं। छोटी-छोटी खुशियों एवं पलों को साथ जीते हैं। हालांकि, कोरोना काल में बहुत कुछ बदल गया। इच्छा होने के बावजूद पिता बाहर नहीं निकल सकते थे। न बाजार जाना हो पाता था और न सैलून। व्यवहार में चिड़चिड़ापन आ रहा था। तब संयुक्ता ने काम के बाद पिता के लिए अलग से समय निकालना शुरू किया। उनके बढ़े हुए बाल काटे, शेविंग आदि की। अगर वह उत्तेजित हुए,तो बड़ी ही धैर्यता से उन्हें संभाला भी। बताती हैं,‘कुछेक बातों पर डैडी एकदम से अड़ियल रुख अपना लेते हैं। उन्हें समझाना टेढ़ी खीर हो जाता है। जैसे,वैक्सीन न लगाने को लेकर अड़े हुए थे। काफी अनुनन विनय के बाद माने। उसका ही परिणाम है कि अब एहतियात के साथ बाजार चले जाते हैं। अपने पसंद की खरीदारी कर लाते हैं। दरअसल,ये दौर ही ऐसा है कि चारों ओर फैली नकारात्मकता एवं अकेलेपन से आपको खुद ही जूझना है। वैसे में एक उम्र पार कर चुके हमारे माता-पिता को उनके बच्चों व अपनों की सबसे ज्यादा जरूरत है।‘

ससुर-बहू के रिश्ते का दिखा नया रंग: निजी कंपनी में वरिष्ठ पद पर आसीन शुभांगी खत्री इन दिनों रिमोट वर्किंग कर रही हैं। उनके काम के घंटे बढ़ गए हैं। लेकिन संयुक्त परिवार में रहने के कारण परिजनों की देखभाल की भी जिम्मेदारी है। घर पर रहने के कारण बच्चों के साथ-साथ बुजुर्गों की जरूरतें समय-समय पर पूरी करनी होती है। बीते दिनों उनके ससुर कोविड की चपेट में आ गए। शुभांगी को काम से ब्रेक लेना पड़ा। बताती हैं,‘परिवार मेरी प्राथमिकता है। ससुर ने पिता से बढ़कर साथ दिया है। आज जिस मुकाम पर हूं ,उसमें उनकी बड़ी भूमिका रही है। फिर जब उन्हें जरूरत होती है, तो मैं कैसे न समय निकालूं?’ निखत को भी अपने ससुर से पिता समान प्यार एवं सम्मान मिला है। शादी के समय जब उनके सिर से पिता का साया छिन गया था, तब ससुर ने ही पूरी जिम्मेदारी निभायी और बेटी की तरह उन्हें अपने घर ले गए। उन्हें हर वह आजादी दी, जिससे वे खुद को आत्मनिर्भर बना सकें। निखत ने बताया,‘अब्बा ने कब पापा की कमी को भर दिया,पता ही नहीं चला। वे हमेशा हौसला देते हैं कि कभी अपनी बात कहने में संकोच नहीं करना चाहिए और न ही गलत का साथ। कुछ महीने पहले जब पति के साथ रिश्ते अचानक से बिगड़ गए, घर का माहौल तनावपूर्ण हो गया, तो अब्बा ने न सिर्फ हालात को संभाला,बल्कि सच का साथ देकर मेरा मान भी बढ़ाया।‘ किसी ने सच ही कहा है कि रिश्ता होने से रिश्ता नहीं बनता, रिश्ता निभाने से रिश्ता बनता है। दिल से बनाए हुए रिश्ते आखिरी सांस तक चलते हैं।

मुश्किल दौर में बेटियों का मिला सहारा: ‘मां के जाने के बाद डैडी टूट से गए थे। तब हम बहनों ने उन्हें किसी तरह से संभाला। लेकिन कोविड ने जब बड़ी बहन को भी छीन लिया, तो वह होश खो बैठे। एक महीने अस्पताल में रहना पड़ा। कुछ पता नहीं था कि क्या होगा? हमने पूजा-पाठ से लेकर न जाने क्या-क्या किया। आखिरकार सबकी दुआओं का असर हुआ और वे घर लौट आए। हां, पूर्ण रूप से स्वस्थ होने में वक्त लगा।‘ ये कहना है मार्केटिंग प्रोफेशनल शैलजा का। वे बताती हैं,‘80 वर्ष के हो चुके हैं डैडी। लेकिन आज भी किसी पर बोझ नहीं बनना चाहते। अकेले रहते हैं और सारे कार्य खुद ही करते हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं अस्पताल से लौटे हुए। लेकिन योग-प्राणायाम, सुबह की सैर से खुद को काफी हद तक फिट कर लिया है।‘ शैलजा की खुद्दारी की एक बड़ी वजह उनके पिता ही हैं। उन्होंने ही उन्हें मानसिक रूप से इतना सशक्त बनाया है कि दिव्यांग होने के बावजूद वे अपनी शर्तों पर जीती हैं और सामाजिक कार्यों में तत्पर रहती हैं। कहती हैं,‘हर बेटे और बेटी में उनके माता-पिता का अक्स होता है। जब हम अपने अभिभावकों के विचारों का सम्मान करते हैं, तो वह हमें हर चुनौती से लड़ने का साहस देती है।‘

पिता से मिला सबको साथ लेकर चलने का संस्कार: ब्रांड रेडिएटर की सीईओ हिमानी मिश्रा ने बताया कि हम तीन बहनें हैं। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में, बेटा न होने के कारण मां को परिवार तथा समाज से हमेशा काफी कुछ सुनने को मिलता रहा। परंतु उन्होंने कभी अपनी भावनाओं को हमारे सामने व्यक्त नहीं किया। पिता ने उनका साथ दिया और विपरीत परिस्थितियों में भी हम तीनों बहनों को वह सब कुछ दिया, जिसका हकदार वे हमें समझते थे। आज बिजनेस के साथ अपने परिवार के प्रति हर ज़िम्मेदारी का निर्वहन करती हूं। जरूरतमंदों की मदद करती हूं। कोरोना काल में जब लोगों की नौकरियां जा रही थीं। कंपनियां बंद हो रही थीं, तब मैंने टीम के सदस्यों की तमाम सुविधाएं जारी रखीं। उनका मनोबल बढ़ाती रही। यह संस्कार मुझे मेरे पिता से ही मिले हैं कि आप जितना दूसरों की मदद करते हैं, उतनी दुआएं आपको मिलती हैं।

दुआओं से हुई डैड की वापसी: आरजे ममता सहगल ने बताया कि मेरे पिता ने हमें हर प्रकार की आजादी दी थी। पढ़ाई पर खास जोर देते थे और एक बात जरूर कहते थे कि मुझसे कुछ छिपाना नहीं और मेरा सिर कभी झुकने नहीं देना। वे काफी स्ट्रांग शख्सियत के मालिक रहे हैं। भारतीय नौसेना से रिटायर होने के बाद भी कभी घर पर नहीं बैठे। कुछ न कुछ करते रहे। दिल के मरीज होने के बावजूद कोरोना काल में हर किसी की मदद के लिए तत्पर रहे। लेकिन जब वे कोविड पाजिटिव हुए और उन्हें अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा। वे वेंटिलेटर पर थे। लगा कि मानो रातों रात हमारी दुनिया ही बदल गई। मां को भी अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा। परिवार के अन्य सदस्य तक कोरोना से ग्रस्त हो गए। उस समय तो डैडी ने भी जैसे हार मान ली थी। हमने कई रेकी एवं एनर्जी हीलर्स की सहायता ली। महामृत्युंजय जाप कराया। हमें डैड से मिलने की इजाजत नहीं थी, तो अस्पताल में भर्ती मां ही उन्हें हिम्मत देती थीं। 23 दिन अस्पताल में रहने के बाद पापा घर लौट आए। हमने पहली बार दुआओं एवं प्रार्थना का इतना गहरा असर देखा।

डैड ने सिखाया हार न मानना: समाजसेवी आरती मधुसूदन ने बताया कि अपने पैरेंट्स से हमने जीवन के कई मूल्य सीखे हैं। खासकर ये कि तब तक लगे रहो, जब तक कि काम पूरा न हो जाए। लक्ष्य को प्राप्त न कर लें। अभी कोविड काल का ही एक उदाहरण है। हमारे एक बुजुर्ग रिश्तेदार को पोस्ट आफिस का कुछ काम था। मेरे डैड तुरंत सक्रिय हो गए। हमारे समझाने के बावजूद वे नहीं माने और अगले दो दिनों में 100 से अधिक काल करने के बाद पोस्ट आफिस के किसी वरिष्ठ अधिकारी से संपर्क हुआ। वहां से कुछ अन्य कान्टैक्ट मिले और रिश्तेदार का काम हो गया। कमाल की बात ये रही कि डैड किसी भी अधिकारी को नहीं जानते थे। लेकिन वे लगे रहे और आखिर में अपने मकसद में कामयाब हुए। उन्हें न कोविड का डर था और न ये कि लोग क्या कहेंगे?

Edited By: Sanjay Pokhriyal